यात्रा…….उत्तराखंड : : मुंसियारी शहर

   

  दिन के अभी ग्यारह बजे थे , और हमारी मंजिल ” मुंसियारी “” सौ किलोमीटर से अधिक दूरी पर थी ।विश्वास था कि अंधेरा होने तक हम वहां पहुंच जायेंगे ।कुछ दूर चलने के बाद हमारा ध्यान गया कि हम लगातार ढलान की ओर बढ़ रहें है ।वन क्षेत्र भी कम होने लगे थे ।जैसे जैसे हम नीचे उतरते गए ,मार्ग में थोड़ी थोड़ी आबादी के पहाड़ी गांव भी ,दूर पास दिखाई देने लगे ।सड़क मोड़ तोड़ वाली ही थी ।ऐसा होता कि एक पर हम अपने को निर्जन जगह पर पाते , कि दूसरे मोड के अचानक बाद ,गांव का आबादी क्षेत्र आ जाता ।

     

 हम सब अभी भी आज सुबह के अभूत पूर्व अनुभव में डूबे हुए थे ,जिसके कारण वर्तमान सफर में हमे कोई रोचकता नही आ रही थी । ऐसे ही कोई हम एक घंटे ही चले होंगे कि एक सामने दिखाई दिया बड़ा सा गांव ,जिसके शुरुआत में बोर्ड लगा था “” दुग्गड़ा “” गांव !! 

    इस गांव के नाम को पढ़ते ही मैं अचानक 1980 के दशक में खो गया ।मुझे याद आया कि अखबारों ,रेडियों पर ,उन दिनों एक ही खबर चल रही होती थी ,”” नरभक्षी तेंदुआ की ,जिसने इस दुग्गड़ा गांव में आतंक एवम भय का इतना माहौल बना दिया था कि इस गांव के ही नही ,इसके आसपास के गांव के निवासी  भी इस नरभक्षी के कारण ,सुरक्षित स्थान पर पलायन करने को मजबूर हो गए थे ।ये आतंक कोई एक वर्ष तक रहा , एक सौ से अधिक इंसानों का शिकार करने  के बाद ही इस नरभक्षी तेंदुए को मारने में सफलता मिल पाई थी ।अब इस ऐतिहासिक गांव में अपने को अचानक पा कर मैं रोमांचित हुए बिना नहीं रह पाया ।हमने इसके किनारे कार रोकी ,नीचे उतर ,पुराने समय में हुई उस घटना के रोमांच में डूबने से लगे । मैने आस पास की जगह को गौर से देखा तो कुछ कुछ समझ आने लगा कि गांव के नीचे ,ऊपर देवदार के पेडों के घने वन होने एवम ,अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जब इस गांव के निवासी ,इन जंगलों में जाते होंगे ,तभी इन आसान मानव शिकार को देखकर ,शायद तेंदुआ ,नरभक्षी हो गया होगा ।

     

 कुछ देर यहां ,रुक ,हम फिर नीचे पहाड़ों की संकरी घाटी में उतरने लगे ।तभी एक आश्चर्य से भी हमारा सामना हुआ ।हमारे दाईं ओर एक छोटी सी सड़क हमसे मिली ,जिसके किनारे बोर्ड लगा था “” मंसूरी नगर “” , छह किलो मीटर ! ये हमारे लिए थोड़ा हैरानी की बात थी । कहां पहाड़ों की रानी “” मसूरी “” और कहां ये इतनी दूर ,दुर्गम पहाड़ों के बीच बसा गांव “” मंसूरी नगर “” । शायद ही  मसूरी शहर और इस गांव ,मंसूरी शहर के लोग , आपस में नामों के इस संयोग से परिचित होंगे। नामों की इस समानता से हम सब अपने को मुसुकराने से भी नही रोक पाए ।

खैर ,हमारी मंजिल ये गांव नही था ,इस लिए हम और आगे बढ़ गए।अभी हम कुछ और ही दूर चले थे , कि एक तीखा मोड़ आया ,उस मोड़ के बाद जो  नजारा हमें दिखाई दिया ,हम एक बार तो भय एवम रोमांच से भर गए ।चलिए ,हमारे साथ साथ आप भी इस रोमांचकारी दृश्य ,जिसका हमारी पूरी उत्तराखंड की यात्रा में फिर कभी सामना नहीं हुआ ।कुछ फोटों के द्वारा शायद आप भी इसे महसूस कर सकें इस लिए नीचे , इन दृश्यों की कुछ फोटो भी देखें ।

   

  हमने देखा कि हमारी सड़क ,ठीक सामने खड़े पहाड़ की चोटी तक जाती दिखाई दे रही थी ।हमारी सड़क को भी उस तक पहुंचने के लिए एक दम नीचे ,कोई दो हजार फुट की निचाई पर पहुंच कर ,पहाड़ों की तलहटी में बहती एक पहाड़ी झरने नुमा नदी को ,लोहे के बने पुल से पार पार करना था  ।सामने पहाड़ तक पहुंचने की दूरी भी कोई बीस किलोमीटर की होगी ।अब सड़क का हाल सुनिए । पूरी सड़क ,सड़क नही बल्कि ,खिसकते पहाड़ों के छोटे बड़े पत्थरों के टुकड़ों से भरी हुई थी ।उसकी चौड़ाई बस इतनी ही थी कि हमारी कार ही निकल पाए !उसके एक और खिसलते पहाड़ तो दूसरी ओर सीधी गहराई ,जिसके किनारे कोई भी पुस्ता या रुकावट नहीं थी ।उस पर ये और हाल , कि जगह जगह छोटे मोटे झरनों से गिरता पानी ,इस सड़क की दुर्दशा को और बढ़ाने में लगे थे ।

      खैर ,ड्राइविंग सीट पर पूरी सावधानी के साथ ,सड़क के ठीक बीच ,नजरों को गड़ाए ,हौले हौले ,आगे बढ़ने लगे ।मेरे साथ बैठे मेरे साथी ,तेज नजरों से यही देख रहे थे कि हमारी कार सड़क के ठीक बीचों बीच रहे ,चाहे जो हो जाए ,पर , कार का पहिया गहरे खड्ड से दूरी बनाए रखे ।इन सब में रोमांच इतना कि हम सब ,सारे नजारे भूल,सांस रोके बैठे थे ।वो तो ऊपर वाले की कृपा ,ड्राइविंग की कुशलता ने हमें इस जोखिम से पार लगा ही दिया !!

           

 सड़क के दूसरे पहाड़ पर ,एक सुरक्षित जगह पहुंचते ही हमने कार रोकी और उतर के ये देखने लगे ,नही नही ,ये महसूस करने लगे कि हम कितने बड़े जोखिम को पार कर के आए हैं !

       

 शुक्र था कि आगे सड़क कुछ बढ़िया बनी दिखाई देने लगी थी ,उसका कारण भी हमे जल्दी ही पता लग गाया ।वो इस लिए कि पीछे छूटी खतरनाक सड़क को पार करने के कुछ ही दूर बाद ,एक और सड़क ,हमारी सड़क से मिल गई ।बोर्ड से पता लगा कि ये सड़क ,उत्तराखंड के बहुत ही महत्वपूर्ण शहर “” पिथौरागढ़ “” से आ रही है ,जो कि ना केवल उत्तराखंड के अंतिम छोर पर बसा हुआ है ,बल्कि ,नेपाल जाने के लिए भी ये एक महत्वपूर्ण शहर  है ! 

     

 उसके बाद ,लगातार हमारी सड़क हमें हिमालय की ऊंचाइयों पर ले जाने लगी ,इसके साथ साथ ,मार्ग ,छोटा एवम घने वन क्षेत्रों में प्रवेश करने लगा ।

   

 आखिर कार ,जब हम एक बहुत ही ऊंची चोटी पर पहुंचे ,एक मोड़ काटा ,तो सामने थे ,विशाल ,महान हिमालय ,उसकी बर्फ से ढकी चोटिया ।तभी एक बोर्ड देखा “” मुंसियारी “” सात किलोमीटर ! चलो हम ,हमारी मंजिल तक पहुंच ही गए ।

     

 अब मुनस्यारी शहर तक सीधे ढलान थी ।दूर से ही हमे बर्फ से लदी चोटियां के ठीक नीचे बड़ा ,छोटा सा मुनस्यारी शहर दिखाई देने लगा था । और तीन किलोमीटर नीचे उतरते ही हमारा एक सुखद आश्चर्य से सामना हुआ ।हमारी सड़क के दोनो ओर बर्फ बिछी दिखाई देने लगी थी ।थोड़ा और नीचे उतरे तो लगभग पूरे शहर पर ,बर्फ की चादर सी बिछी हुई थी ।

   

 मुंसियारी शहर ,उत्तराखंड के अन्य पर्वतीय शहरों के अपेक्षा ,हमे ,बहुत ही छोटा लगा ।गिनती के तीन चार होटल ,खाने के लिए कोई भी ढंग का होटल नहीं,एक ही लंबा ,बाजार ,जो कि आम दैनिक प्रयोग में आने वाली चीजों से भरा हुआ ,कुछ छोटी बड़ी ,चाय की दुकानें ।ये सब देखने में हमे कुल बीस मिनट ही लगे ।कोई भी आकर्षण की ना तो जगह ,ना ही कोई वजह ! शाम ढलने को हो रही थी ,बस उस शाम की सुनहरे प्रकाश में एक ही चीज हमें आकर्षित कर रही थी तो वह थी ,हिमालय की बर्फ से ढंकी सुनहरी   चोटियां ।ये इतना छोटा शहर था कि शीघ्र ही हमारा इस के प्रति आकर्षण समाप्त होने लगा ।निष्कर्ष यही निकाला कि ,यहां का एक ही आकर्षण है , वो है इस शहर से एक दम सटी हिमालय  की चोटियां ।जिसे हमने अच्छी तरह से देख  ली थीं  ,इस लिए निर्णय लिया कि बजाए ,यहां रात बिताने के ,आगे ,कोई अस्सी किलोमीटर दूर ,एक बहुत ही बड़े शहर , “”पिथोरा गढ़ “” की ओर चला जाए  !फिर क्या था ,मुंसियारी शहर में दो घंटे के करीब बिता ,गरमा गरम पकोड़ों के साथ चाय पीकर , कार बढ़ा दी “” पिथौरागढ़ “” की ओर !

     लगभग ,चार घंटों की यात्रा कर ,मार्ग में पड़ने वाले कई छोटे मोटे कस्बों को देखते ,रात के नौ बजे के करीब ,जा पहुंचे “” पिथौरागढ़ “” !!

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