
कोरोना की दूसरी लहर का खात्मा, ,वेक्सिन का कोर्स भी पूरा ,गर्मी का भी खात्मा ,तो …..फिर क्या था ,मन का पंछी बरसात की फुहारों में भीगने को ,उड़ने को व्याकुल हो उठा ,परंतु वही पिंजरे का दरवाजा अभी भी बंद था।कहते हैं ना कि जहां चाह ,वहां राह ! जैसे ही मेरी श्रीमती जी के पास फोन आया कि उनकी माताजी की तबियत नासाज है और वो अपनी बड़ी बेटी को याद कर रही है तो दरवाजा खुलने का भी इंतजाम हो गया।

इधर शताब्दी ट्रेन भोपाल की ओर चली ,उधर मेरा भी प्रोग्राम सीधे भगवान राम के वनवास काल में बिताए गए साढ़े ग्यारह वर्ष के स्थल “” चित्रकूट “” धाम की यात्रा के लिए बन गया।सीधे फोन किया अपने मित्र “” जे पी शर्मा “” जी को।जे पी भाई भी मेरी ही तरह खुले आसमान में उड़ने वाले पंछी है, स्वीकृति मिलनी ही थी ,मिल गई , और अगले दिन ही हम चल पड़े “” भगवान राम ,लक्ष्मण और माता सीता “” के वनवास काल के दौरान बिताए गए स्थल की छांव में ,उनकी स्मृतियों को सहेजने “” चित्रकूट “” की राह पर !

प्रातः ठीक छह बजे हम दोनो अपनी नई कार के साथ मथुरा झांसी हाई वे पर थे।भले ही बरसात के दिन थे परंतु मेघों के स्थान पर सूर्य प्रातः से ही अपनी पूर्ण चमक के साथ चमकते हुए ,उन पर अपनी विजय के दर्प से जैसे मुस्कुरा रहे थे।एक घंटे में हमने आगरा शहर को आसानी से पार कर लिया था क्योंकि अभी ये महानगर सुबह की नींद की खुमारी में जैसे डूबा ही हुआ था।

आगरा शहर पार करते ही ग्वालियर झांसी हाई वे पर इक्का दुक्का वाहन ही रह गए।ये मार्ग एक दम नया बना था ,द्वि मार्गी था इस लिए हमारी कार को तो जैसे पंख लग गए ।इन दिनों हाइवे पर एक बड़ी ही अच्छी सुविधा हो गई है कि पूर्व की तरह यात्रा के मध्य पड़ने वाले शहरों के बीच से अब गुजरना नही पड़ता है।लगभग हर छोटे बड़े शहर अथवा कस्बों को किनारे करते हुए “” बाई पास “” बन गए है ,जिनके कारण इन कस्बों ,शहरों को पार करने में लगने वाले व्यवधान एवम समय की बचत हो गई है।इस लिए पता ही नही चला कि कब आगरा शहर के साथ साथ धौलपुर ,ग्वालियर ,दतिया आदि शहर निकल गए।इस यात्रा में मैं दो विशेष अवसरों का जिक्र भी अवश्य करना चाहूंगा ,पहला ये कि जब हम ग्वालियर बाई पास से ,जा रहे थे तो देखा कि एक स्थान पर बाईपास को थोड़ा अलग से मोड़ कर बनाया है,थोड़ी हैरानी और बढ़ गई जब देखा कि इस मोड़ से पहले ही लगभग हर गाड़ी बाईपास छोड़ कर उस पुरानी सड़क पर मुड़ रही है तो हम भी जिज्ञासा स्वरूप उस और मुड़ गए ।सामने था एक विशाल ,भव्य ,सुंदर मंदिर ,जिसके आमने सामने हनुमान जी तथा मंदिर के महंत के बड़े बड़े पोस्टर लगे थे।पूरा मार्ग गाड़ियों से भरा हुआ था।हमने भी गाड़ी रोकी और श्रृद्धालुओं के साथ मंदिर में प्रवेश कर गए।

अब ये तो अनुभव की बात है कि हमने वहां क्या प्रतीत किया ,परंतु मंदिर के बाहर ,अंदर बड़ी भारी भीड़ थी।कुछ लोगों से जब बात की तो ज्ञात हुआ कि ये ग्वालियर ,झांसी ही नही दूर दूर तक लोगों की इस मंदिर में बड़ी श्रद्धा है,जो भी कामना होती है वो अवश्य पूरी होती है।हमने भी हनुमान जी की प्रतिमा के आगे हाथ जोड़े और अपनी यात्रा की सकुशल पूरी होने की मान्यता मांगी ,फिर मंदिर के बाहर आ गए।दूसरी विशेष बात यह कि ग्वालियर से थोड़ा पहले दतिया नाम का एक छोटा सा शहर है।ये शहर सिर्फ एक बात के लिए जाना जाता है वो है “” मां पीताम्बरी देवी “” का मंदिर ! अब ये दतिया हमारे पूर्व निर्धारित मार्ग में ही था तो हमने भी निश्चय कर लिया की इस सुअवसर का लाभ उठाना ही है।

मां पीताम्बरी देवी के दर्शनों के लिए हमने मुख्य मार्ग छोड़ दिया और शहर की भीड़ भाड़ वाली सड़कों का रुख कर लिया।पांच किलोमीटर की यात्रा में इस कारण समय लगना ही था ,और वो लगा ,फिर सामने नजर आया मंदिर का मुख्य दरवाजा,जो की दर्शनार्थियों तथा सामान्य आने जाने वालों के कारण एक दम भरा हुआ था ।

अब समस्या आई कि कार को कहां खड़ा करें।पार्किग का कोई स्थान नहीं। विवशतावश कार को थोड़ा और आगे बढ़ाया ,पर जहां भी कार रोकते,बगल के दुकानदार शोर मचाने लगते , आगे चलो आगे चलो ।तो फिर इन परिस्थितियों में जैसा कि पूरे भारत में होता है ,अचानक कहीं से कोई युवक प्रगट होता है और जबरदस्ती कार को कहीं भी खड़ा करवा के स्थानानुसार बीस या तीस रुपए की मांग करता है ,तो फिर इस स्थान पर हमने भी यही उपाय अपनाया ,और चल दिए मां पीताम्बरी देवी के दर्शनों के लिए।

पीताम्बरी देवी , जैसे कि नाम से प्रगट होता है ,,देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप है।अब चूंकि मेरे विचार से ग्वालियर ,दतिया आदि अन्य शहर बुंदेलखंड संभाग में स्थित हैं ,और इसी में आता है प्रख्यात अथवा कहें ” कुख्यात ” चंबल जो कि केवल और केवल दो ही कारणों से जाना जाता रहा है ,एक तो चंबल के निर्जन ,ऊबड़ खाबड़ बीहड़ नुमा मैदान ,और दूसरे इन बीहड़ों में रहने वाले अनेकों डाकू !अब कहा जाता है कि जब भी ये डाकू कहीं डाका डालने अथवा कोई भी अपराध करने जाते थे तो अपने इन कार्यों की सफलता के लिए वे किसी न किसी देवी देवता से मान्यता मांगते थे और कार्य सफल होने के बाद उन्ही देवी देवताओं को धन्यवाद देने के लिए आते जाते थे।इतिहास गवाह है कि पूरा बुंदेलखंड में मनोकामना पूरी करने के लिए यहां दतिया स्थित देवी मां पीताम्बरी देवी की मान्यता आज भी एक सिद्ध स्थल माना जाता है।
खैर ,हम भी इंसान हैं पुरानी विचारधारा के ही हैं ( हमारी संतानों की दृष्टि में !!) इस लिए अब हमारी चित्रकूट धाम की ये यात्रा कुशलता से हो जाए ,शायद मन के इन्ही विचारों से प्रभावित हो हम भी मां पीताम्बरी देवी के दर्शनों के लिए आ पहुंचे।
मंदिर के बाहर ही से हमारी पूरी तरह चेकिंग के पश्चात जब अंदर प्रवेश किया तो पाइपों से घिरे मार्ग पर इस भरी दोपहरी में भी दर्शनार्थियों की लंबी पंक्ति लगी हुई थी।धीरे धीरे मुख्य मंदिर जो कि प्रवेशद्वार से सौ फुट की दूरी पर था ,और जिसके दोनो ओर अन्य हिंदू मंदिरों की तरह अनेकों देवी देवताओं की मूर्तियां लगी हुई थी।आधे घंटे पश्चात जब मुख्य मंदिर के पास पहुंचे तो देखा अन्य मंदिरों से भिन्न इस मंदिर की मूर्ति के दर्शन के लिए एक छोटी सी खिड़की है जिसके अंदर खड़ा पुजारी ,दर्शनार्थियों से भेंटपुजा की सामग्रियां लेकर ,कुछ प्रसाद रूप में वापस कर देता था।अब जब तक हम ढंग से मूर्ति को निहारते कि आसपास खड़े सुरक्षा प्रहरियों ने हमें आगे बढ़ने के लिए विवश कर दिया। यानी केवल आधे मिनट में ही जब तक हम अपनी मनोकामना मन ही मन कहते ,हम पंक्ति से बाहर धकेले जा चुके थे। खैर ,थोड़ा बाहर आकर ,सामने जो विशाल आंगन था , जहां हमारी ही तरह अन्य श्रद्धालु दूर ही से हाथ जोड़े ,मन ही मन अपनी कामना की पूर्ति कह रहे थे। अब चारों ओर दृष्टि घुमाई तो सामने कुछ ही दूर पर एक विशाल लेकिन खाली तालाब ,जिसके चारों ओर सीढियां बनी हुई थी नजर आया।मंदिर के दूसरी तरफ अनेकों पुजारी अपने यजमानों के लिए पूजा पाठ में व्यस्त थे ।पुनः एक बार दूर से ही सही ,हमने हाथ जोड़े और बाहर जाने के लिए बढ़ गए।

पुनः हम अपनी यात्रा के लिए आगे बढ़ गए। अभी लगभग ग्यारह ही बजे थे ,झांसी अभी भी सौ किलोमीटर दूर थी कि जे पी भाई बोल उठे ,ऋषि भाई साहब क्या ये यात्रा हमने व्रत के साथ करनी है ? उनकी बात का आशय समझते ही मैने तुरंत सामने चमकते एक बड़े से होटल नुमा ढाबे के सामने कार को रोक दिया। कार से उतरते ही मुझे भी अहसास हुआ कि मेरा भी पेट पिचका जा रहा है। आस पास मंडरा रही भोजन की महक ने भोजन के ऑर्डर देने की समय अवधि को जैसे कई गुना बढ़ा दिया था।सब कुछ भूल कर हम दोनो नाश्ता पानी में लगे ही थे कि समीप की मेज़ पर एक दंपती के स्वर ने हमे चौंका दिया।वे झांसी शहर के समीप “” ओरछा “” की बात कर रहे थे।तब मुझे स्मरण हो आया कि ओरछा तो भारत का एक प्रसिद्ध टूरिस्ट स्थान के साथ साथ भगवान राम जी की एक वास्तविक दंतकथा से भी जुड़ा हुआ है।

लगभग दो सौ वर्ष पहले ओरछा के राजा मधुकर शाह बुंदेला की रानी गणेश कुंवर ,जो कि भगवान राम जी की अटूट भक्त थी ,उनके दर्शन हेतु अयोध्या धाम में गई।वहां कनक भवन में भगवान राम जी के दर्शनों के पश्चात वे उनके ध्यान में इतनी डूबी कि उन्होंने सारे राज काज से अपने को अलग कर लिया।इधर ओरछा के राजा को जब रानी का ये हाल पता चला तो उन्होंने रानी को विवश किया कि वे वापस ओरछा आएं।किंकर्तव्य मूढ़ हो रानी ने भगवान राम से मन ही मन प्रार्थना की कि या तो आप मेरे साथ ओरछा चले नही तो में यहीं अपने शरीर को त्याग दूंगी।कहते है कि भगवान राम ने उन्हें स्वप्न में कहा कि अगर तुम अपने ओरछा के महल में मेरा मंदिर बनवा दो तो में तुम्हारे साथ चल सकता हूं।रानी ने तुरंत राजा को संदेश भिजवाया कि अगर आप ओरछा के मेरे महल में भगवान राम जी के लिए एक विशाल मंदिर बन वा दें तो वे अयोध्या से भगवान राम की प्रतिकृति वहां स्थापित करने की शर्त पर ही ओरछा आएंगी।ओरछा के राजा भी बड़े ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे।उन्होंने रानी को संदेश प्रेषित करने के साथ साथ ही महल में भगवान राम के निवास के लिए एक विशाल मंदिर का निर्माण कार्य आरंभ कर दिया।

रानी ने अयोध्या के मूर्तिकारों से कहकर भगवान राम की एक मूर्ति का निर्माण आरंभ करवा दिया।लगभग छह माह के पश्चात इधर राम जी की मूर्ति को लेकर रानी ओरछा की यात्रा के लिए अग्रसर हो गई।ओरछा के राजा ने भी मंदिर निर्माण करने वाले कारीगरों से भी स्पष्ट कह दिया कि रानी के अयोध्या से ओरछा आने में छह मास का समय लगेगा ,तो इन्ही छह मास में आप सब को श्री राम जी का मंदिर तैयार करना हैं।जनश्रुति है कि छह मास के पश्चात जब रानी ओरछा पहुंची तब तक किन्ही कारणों से मंदिर का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका ।तब विवश हो रानी ने निर्णय लिया कि भगवान राम की मूर्ति को उनके महल की रसोई में ही स्थापित कर दिया जाए ,एवम जब मंदिर तैयार हो जाएगा ,तब उसमे भगवान राम की मूर्ति स्थापित कर देंगे।अब भगवान का चमत्कार देखिए कि जब मंदिर बन कर तैयार हुआ तो शुभ मुहूर्त में, महल की रसोई में स्थापित भगवान राम की मूर्ति अनेकों उपायों के पश्चात भी अपने स्थान से हिली भी नही।आखिरकार सारे उपायों के निष्फल होने के बाद निर्णय लिया गया कि भगवान राम की मूर्ति को रसोई में ही स्थापित रहने दिया जाए।तब से आज तक भगवान राम की मूर्ति महल की रसोई में ही स्थापित है।साथ ही इस चमत्कार के कारण ओरछा के राजा इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तब से ओरछा के राज पद से अपने को मुक्त कर दिया और भगवान राम जी को ही ओरछा का शासक नियुक्त कर दिया।उस दिन से आज वर्तमान समय तक भी ,कितने ही शासक आए गए ,ओरछा के राजा के रूप में भगवान श्री राम की ही मान्यता है ,यहां तक कि प्रत्येक सुबह एवम शाम को भगवान राम की मूर्ति को जिस भी शासक की सत्ता रही हो ,उनकी सेना की एक टुकड़ी उन्हें राजा के रूप में सलामी देती है।वर्तमान समय में भी भारत सरकार की सेना की एक टुकड़ी इस क्रम को पूरी श्रृद्धा के साथ ,भगवान श्री राम को ,एक राजा के रूप में अपनी सलामी देती है।अब क्या था ,हम गूगल बाबा की शरण में पहुंचे ,ओरछा का मार्ग ढूंढा ,ज्ञात हुआ कि झांसी से पंद्रह की. मीटर एक अलग मार्ग सीधे ओरछा जाता है ,हालांकि पूर्व निर्धारित ” चित्रकूट धाम ” का अलग मार्ग था ,लेकिन अब सीधे उसी मार्ग पर ओरछा जाने का निर्णय कर लिया । एक घंटे चलते रहने के बाद झांसी शहर की रौनक शुरू हो गई। मैं अनेकों बार झांसी से गुजरा हूं लेकिन ट्रेन के ही द्वारा ,क्योंकि इसके आगे भोपाल शहर में ,मेरी ससुराल है , और तब मेरी दृष्टि में झांसी शहर बहुत छोटा सा शहर लगता रहा था ,परंतु जब हम चित्रकूट के मार्ग को छोड़ ओरछा की ओर बढ़े ,एवम उस समय हमने जब झांसी शहर को पर किया तब हमें पता चला कि ये तो एक बहुत ही बड़ा शहर है।
ओरछा जाने वाले मार्ग पकड़ने के लिए हमे इस शहर को पार करना पड़ा ,जिसमे हमे आधे घंटे से भी अधिक समय इस लिए लगा कि, पूरे उत्तर प्रदेश की तरह , यहां भी यातायात के नियमों का कोई पालन नहीं करता !
इन्ही सब विचारो में खोते हुए न जाने कब हमने झांसी शहर को पार कर लिया।अब कुछ ही दूरी से मन व्यग्र होने लगा था , भगवान ,नही ,नही एक राजा के रूप में भगवान श्री राम के दर्शनों के लिए !!

( क्रमश : शेष भाग दो में )
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