कहानी : मेहमान

Rahul Photography
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    “” अरे शर्मा जी ,आपके मेहमान गए क्या “? ” मेहमान” शब्द सुनते ही जैसे आश्चर्य और  धक्का सा लगा ।” वो कुछ दिनों से आप घूमने नही आ रहे थे तो आपके पड़ोसी वर्मा जी ने बताया था कि आपके यहां मेहमान  आए हुए हैं “! अरे नही ,बच्चे आए हुएं  थे ,मैने हंसते हुए जवाब दिया ।

      मन अतीत में पहुंच गया ।वर्षों पूर्व जब मेरे माता पिता आए हुए थे तो हमारी मेड ने भी यही कहा था कि कब जायेंगे ये मेहमान ,तो मेरी माताजी बहुत नाराज हुई थी ,क्यों भई ,हम क्या मेहमान हैं तुम्हारे ? बड़ी ही कठिनाई से ,मेड को डांटते हुए उन्हें समझाया था , कि नही नहीं ये नासमझ है ।

       आज के दौर में अब महसूस होने लगा है कि वास्तव में ,ये मेहमान ही तो हैं ,कुछ दिनों के लिए आते हैं ,घूमते फिरते हैं फिर अपने मुकाम पर वापस चले जाते है ,बिल्कुल मेहमानों की ही तरह !!

     मन अब कहीं अधिक अतीत में गहरे डूबने लगा था ।जब ये बच्चे छोटे छोटे थे तो ,इनसे खेलने ,खाने ,इनकी रोजमर्रा की छोटी छोटी जरूरतें पूरी करते करते ,ना जाने दिन कब फुर्र हो जाता था ।फिर स्कूल छोड़ने ,लाने ,उनके होमवर्क करते ,उनके लंच बेग लगाते , अस्तव्यस्त घर, कपडों ,को सहेजते कभी कभी मन झुंझला जाता कि जाने कब ये इतने बड़े होंगे कि इन सब कामों से मुक्ति मिलेगी ।परंतु ये भी अच्छी ही तरह याद है कि शाम को भोजन के बाद सोने के लिए जब वे मुझसे चिपटते ,कहानी सुनने की जिद करते तो दिन भर की थकान भूलकर एक अनमोल खुशी का अहसास होता जो आज भी मेरे मन मस्तिष्क में कहीं अमिट जिंदा है। हां ,तब कभी कभी पत्नी समझाती कि ये हमारा गोल्डन टाइम है ,इसे इंजॉय करो ।जब इनके पंख निकल जायेंगे तो ये उड़ जायेंगे ,बरामदे में बने गौरैया के घोंसले में चहचहाते बच्चों की तरह जो हर साल पंखों में ताकत आते ही घोंसलों से उड़ जाते जाते हैं कभी वापस नहीं आने के लिए ।

  और फिर सच में बच्चे बड़े होते ही कालेज में पहुंच गए।फिर पढ़ाई पूरी होते ही दूसरे शहर में चले गए, अपने भविष्य बनाने के लिए ,नौकरी ढूंढने के लिए ।शीघ्र ही उनकी नौकरी भी लग गई ,महीने दो महीने में , वीकेंड पर कभी आते ,कभी दो चार दिन ज्यादा रहते ,प्रवासी पक्षियों की तरह, शायद रिश्तों की एक महीन लेकिन मजबूत डोर ,उन्हे हमसे बांधे हुए थी ।     कुछ और समय बीता ,अब वे अपनी अपनी दुनिया में पूरी तरह रंग चुके थे ,लगता है वर्मा जी ठीक ही कह रहे थे ,वे अब “” मेहमान “” हो गए थे ,!! कितना सही कहा था वर्मा जी ने ।

      पिछले कुछ दिनों से बच्चे आए हुए थे ।घर भरा पूरा सा लग रहा था । हर तरफ चहल पहल थी ।समय मानो पंख लगा कर उड़ रहा था 

      फिर उनके जाने की ,वापस लौटने की तयारी होने लगी ।सब अपने आप में व्यस्त थे।नन्हे पोते , पोती ,बार बार अपनी चीजों के बारे में पूछते ,मम्मी ,मेरा रुमाल नही मिल रहा है ,पापा मेरी बेल्ट ढूंढ दो ना !! मैं और पत्नी मूक बने, सब देख सुन रहे थे ।

    अब ! उनके जाने के बाद घर में सन्नाटा पसरा था।सब चीजें अपनी अपनी जगह पर थी।मन एक अवसाद में घिर गया।वर्षों पहले उनके जाने के बाद ,घर अस्तव्यस्त पड़ा रहता था कुछ दिन उन्हे समेटने में लग जाते ,फिर हर कोने में ,हर अलमारी में उनके होने का अहसास होता,पर अब चलते चलते वे हर चीज व्यस्थित कर जाते ,यहां तक कि बिस्तर की चादर भी ठीक से सहेज जाते !जब कभी हम उन्हे ये सब करने को रोकते ,तो वो कहते ,अरे अब आपकी उम्र हो गई है ,आप इतना सब कैसे कर पायेंगे ।तब फिर से, वर्मा जी के शब्द कानों में गूंजने लगते । सच ,मेहमान भी तो वापस जाते जाते , हर चीज पहले की ही तरह सहेज कर जाते हैं।

    अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच ,बच्चे फोन पर एक ही वाक्य कहते “” ठीक से पहुंच गए है ,बाकी बात बाद में करेंगे “” फिर फोन बंद !

       तभी मुझे याद आया “” पापा ,मेरा सेलेक्सन हो गया है “” उनकी आवाज में जो खुशी टपक रही थी ,जिस तरह से वे चहक रहे थे ,उसे आज, फिर से एक बार याद करके, मन एक दम प्रसन्न हो गया ।सारा अवसाद दूर हो गया ! 

    अब मैं सोच रहा हूं की हम भी कितने मूर्ख हैं ।बच्चे अपना बेहतर मुकाम हासिल करने के लिए ही तो उड़ान भर रहे हैं ,जिससे वे अपनी पहचान बना सकें और हमारी पहचान में इजाफा हो सके।सबसे बड़ी बात ,उनका हमसे मिलने आना ,केवल आकर्षण नही ,हमारे प्रति उनका दि लगाव है !!

      अब हम पूर्णतः आश्वस्त हैं ,मोह के बंधन धीरे धीरे ढीले पड़ने लगे है । कहीं ना कहीं अब मन को ये समझ आने लगा है कि बच्चे तो पंछी हैं,पंख निकलते ही उड़ने लगते हैं ।

     अब अंतर्मन से ये ही आवाज निकलती है।                                       

** जहां भी रहो ,खुश रहो ** !!

4 responses to “कहानी : मेहमान”

  1. आधुनिक समय की सच्चाई।

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    1. Radhey Radhey 👌👌👌👍👍

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  2. यह एक कटु सत्य है, बच्चे मां बाप के पास आऐं अथवा मां बाप बच्चों के पास जाएं दोनों स्थितियों में मेहमान जैसा ही व्यवहार नजर आता है। इसमें किसी की कोई कमी नहीं है। वस्तुतः मां बाप बच्चों को बड़ा आदमी बनाने के विचार से अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाते हैं और आशा करते हैं कि उनकी संतान अच्छी सैलरी और सम्माननीय पद प्राप्त करें।अब यह सब घर बैठे तो मिल नहीं जाता अतः बच्चों को घर छोड़कर नई जगह जाना ही पड़ता है। फिर उनकी एक नई दुनिया होती है जिसमें उन्हें अपने बच्चों के भविष्य का दायित्व निभाना पड़ता है। वर्तमान की भौतिक व्यवस्था में यह सब परंपरागत तरीके से चल रहा है। जीवन की इस वास्तविकता में रिश्तों की डोर कमजोर हो रही है। संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बदलते जा रहे हैं। जो भी हो वर्तमान में बचे कुचे रिश्तो को संभाल कर रखने की जरूरत है ताकि पारिवारिक सदस्य मेहमान न बन जाऐं।
    ……. आर.पी.शर्मा, अलीगढ़।

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