कभी कभी अनायास मिला अवसर ” सुअवसर ” में कैसे बदलता है ,उसका अनुभव मुझे तीन महीने पूर्व की गई “” रायपुर “” शहर की यात्रा पर मिला ।बात ये हुई कि छत्तीसगढ़ की राजधानी ” रायपुर ” में मेरी बड़ी साली साहिबा रहती है ,पता नही उन्हे क्या सूझा कि उन्होंने अपनी बड़ी बेटी का जन्म दिनमनाने की ठान ली । तुरंत ही सब रिश्तेदारों को निमंत्रण भिजवा दिया गया ।अब अगर कभी कोई प्रोग्राम ,अचानक बनता है तो अक्सर उस समय कोई ना कोई उससे भी अधिक महत्वपूर्ण कार्य होता है ,परंतु संयोग से मुझे उस समय ऐसा कोई कार्य नहीं था ,संयोग वश ,उस समय, मेरी श्रीमती जी को ,जन्म दिन से भी अधिक महत्व पूर्ण कार्य इस समय था और वो था ,”” वर्ष में एक बार होने वाली किटी पार्टी ” ! अब मेरे जैसे कुछ ही भुक्त भोगी भली भांति जानते है कि पत्नियों के लिए किट्टी पार्टी से महत्व पूर्ण कोई भी काम नही होता ,इस लिए उनका नम्र लेकिन हर हालत में ये आदेश था कि मुझे अकेले ही रायपुर इस फंक्शन में जाना होगा !उनके अनुसार ये रिश्तेदारी का मामला है इस लिए वो नही तो मुझे ही रिश्ते निभाने के लिए जाना ही होगा ।

अब मेरे सुधि पाठक गण जानते ही हैं कि मेरा दिल दिमाग तो जन्म से ही घुम्मकड़ रहा है ,उस पर एक साल से मैं घर से बाहर कहीं भी नही जा पाया था ,इस लिए कृत्रिम ना नुकुर के बाद मेने रायपुर जाने की स्वीकृति दे दी ,जो की देनी ही थी !
अब साली साहिबा का निमंत्रण था तो मैने विचार किया कि मैं एक दिन पहले ही रायपुर पहुंच कर उन्हे चौका दूंगा, तो बढ़िया रहेगा ,इस लिए एक दिन पहले की ट्रेन में सीट बुक कराई ,चौबीस घंटे का सफर था तो ,ट्रेन में बैठते ही चद्दर तानी और निंद्रा देवी के आगोश में अपने को समा दिया ।
जब डिब्बे में शोर शराबा सा हुआ ,आंखे खोली तो देखा ,सब अपने सामान सहित उतरने की तैयारी में लगे हुए है ,ओह ! राय पुर आ गया ! मैं भी झटपट उतर ने के लिए तैयार हो गया ।

रायपुर छत्तीस गढ़ की राजधानी तो अवश्य है ,पर ,ऑटो में बैठ ,जब साली साहिबा के घर का आधे घंटे का सफर चल रहा था ,तो कहीं से भी नही लग रहा था कि ये किसी प्रदेश की राजधानी भी है ।सब कुछ लगभग वैसा ही था जैसे कि दस वर्ष पूर्व था ।वही छोटी छोटी दुकानें ,स्कूटर ,टेंपो ,साइकल पर आते जाते लोग , छोटे छोटे,पुराने डिजाइनों के मुहल्ले नुमा घर ,सड़कों पर घूमती गाएं , हां ,पर कभी कभी दो चार नई सी ,बड़ी बड़ी सी कोठियां दिखाई दे जाती ,लोगों के रंग एवम वेशभूषा में बिहारियों जैसा प्रभाव ,यानी कहने का अर्थ की नए पन का कोई चिन्ह भी नही !लेकिन एक बात पर अवश्य गौर किया ,जो लोग भोपाल को तालाबों का शहर कहते हैं ,वे अगर एक बार रायपुर आ जाएं तो कह उठेंगे ,अरे ,असली तालाबों का शहर तो रायपुर है ।आधे घंटे की इस यात्रा के दौरान ,थोड़ी थोड़ी दूरी पर छोटे से ले कर बड़े बड़े तक ,मैने तीस से अधिक तो तलाब देख ही लिए थे , परंतु भोपाल के तालाबों के मुकाबले उनमें किसी का भी सौंदरीयकरण नही था ,वे सब के सब वर्षों पुराने ही लग रहे थे ।
खैर ,भीड़ भरी छोटी छोटी सड़कों पर चलते हुए जब मैने घर पहुंच कर दरवाजे की बैल बजाई ,तो साली साहिबा सहित सारे सदस्यों की शक्ल देखने लायक थी ।
अब ये तो पारिवारिक बातें थी ,लुब्बो लुबाव कुछ देर बाद ये निकला कि इस जन्म दिन पर उन्हे मेरी तो क्या किसी भी अन्य रिश्तेदार के आने की उम्मीद नहीं थी ! इसी लिए उन्होंने मेरे पहुंचने के समय पर रायपुर शहर से कोई एक सौ पचास किलोमीटर दूर ,अपने पुश्तैनी घर जो की दूर दराज का गांव था , में अपने माता पिता के साथ ही इस जन्म दिन को मनाने का कार्यक्रम बना लिया था ।
अब ये सब महसूस करते ही मैने ,मन ही मन निर्णय लिया कि उनसे कहूंगा कि आप लोग परेशान नहीं हों , मैं भी आपके साथ ही आपके गांव चलूंगा , और कुछ दिन छत्तीस गढ़ के गांव के रहन सहन को समझूंगा ,आनंद लूंगा !
उन सब के चेहरे देखते ही समझ आ गया था कि मेरे इस निर्णय से उन सबके चेहरों पर तनाव के बादल छंट से गए थे ।

दो घंटे बाद जब कार द्वारा ,गांव के लिए प्रस्थान करने का क्षण आया तो मैने पूछ ही लिया कि आपके गांव का नाम क्या है! जी। ** बिलाई गढ़ ** ,क्या कहा ,फिर से कहिए ,वही उत्तर ,जी ,बिलाई गढ़ । मैं इस तरह के नाम को सुनने के लिए तैयार ही नहीं था , और शायद आपने भी नही सुने होंगे ,पर नाम तो यही था । मैने तुरंत ही गुगल मैप खोला ,तब इस बिलाई गढ़ गांव को , मैप पर ढूंढने लगा ,मेरे हैरानी की सीमा ही नही रही जब इस नाम का गांव भी मिल गया ।अब बारी थी उस गांव तक पहुंचने के रास्ते की , जो कि गुगल मैप अच्छी तरह से दिखाता है ।मैने फिर गौर किया कि बिलाई गढ़ तक जाने के दो रास्ते हैं एक तो ,जगदल पुर शहर ,जो की उड़ीसा प्रदेश की सीमा पर है ,के राज मार्ग से होते हुए , सौ किलोमीटर चलने पर ,शेष पचास किलोमीटर ,वन क्षेत्र से निकलते हुए तो ,दूसरा रास्ता था ,छत्तीस गढ़ की जीवन रेखा कही जाने वाली ,जानी मानी नदी “” महानदी “” के किनारे किनारे ,लगभग दो सौ किलोमीटर चल कर ,छत्तीस गढ़ के विभिन्न कस्बों ,छोटे छोटे शहरों से होते हुए बिलाई गढ़ गांव तक पहुंचता था ।घुम्मकड़ होने के नाते तुरंत निर्णय ले लिया कि पता नहीं कब इस तरह छत्तीसगढ़ के आसपास घूमने का मौका मिले या नही ,इस लिए निर्णय हो गया कि महानदी के किनारे किनारे चलते हुए ही हम अपनी मंजिल पर जायेंगे ।
जैसे ही इस मार्ग पर आगे बढ़े ,सड़क एक दम संकरी हो गई ,परंतु संतोष की बात यही हुई की इस छोटी सड़क पर आने जाने वाले वाहनों की संख्या नही के बराबर थी ।कभी कभी कोई वाहन मिलता ,और मिलते दूर दराज के छोटे छोटे , ऊंघते हुए से गांव ,! !

अभी हम पचास किलोमीटर दूर चले ही थे की गौर किया किया कि इस सड़क के दोनो ओर, बड़ी बड़ी झाड़ी नुमा पेड़ों ने सड़क को जैसे ढंक सा ही दिया है । हम अभी ये नजारा देख ही रहे थे कि मेरे साढू भाई बोले ,भाई साहब ये देखिए ,ये सब बेर के पेड़ हैं । ” बेर के ,वो भी इतने अधिक संख्या में ,” जी हां ,ये कह कर उन्होंने गाड़ी रोकी ,नीचे उतरे ,ओर जब हम भी नीचे उतरे तो हमारे आश्चर्य की सीमा ही नही रही ।वास्तव में ये सब के सब बेर की ही झाड़ियां नुमा पेड़ थे जो इस समय बहुत बड़ी मात्रा में पीले ,लाल ,हरे और सूखे बेरों से लदे खड़े थे । इन पेड़ों के नीचे चारों ओर सूखे बेर ही बेर पड़े हुए थे ।ये इतने अधिक मात्रा में थे कि हम हैरान थे ।
मेरी जिज्ञासा को भांपते हुए वो बोले ,चूंकि ये शबरी माता का जन्म स्थल है ,जिन्होंने श्री राम जी को बेर खिलाए थे ,इसी लिए यहां बेरों के पेड़ों की अधिकता है।

तो क्या शबरी जी ,यहीं की रहने वाली थी क्या ! जी हां ! यहीं पास में उनके जन्म का स्थान है ,उनके जन्म स्थान के गांव का,जो अब एक छोटा सा शहर बन चुका है ,उन्ही के नाम से “” शबरी नारायण “” नाम से जाना जाता है ।
यात्रा में मिले इस अद्भुत संयोग से मैं अभिभूत हो गया ।संयोग से इस मिले अवसर को मैं भला कैसे गंवाता ,मैने उनसे अनुरोध किया कि कृपया हो सके तो उस गांव की ओर चलें , पता नही फिर कभी आना हो या नहीं हो। रामायण के अंदर श्रद्धा भाव का जो वर्णन तुलसी जी ने शबरी माता का वर्णन किया है ,उसके समतुल्य और कोई पात्र है ही नही ,इस कारण स्वयं श्री राम भी उनके दर्शन का मोह नहीं छोड़ सके तो ,मेरी क्या मजाल , कि मैं ,अनायास प्राप्त हुए इस अवसर पर उनके जन्म स्थान के दर्शन नहीं करूं ।

मेरे अनुभव को मान कर ,मेरे साढू भाई ने कार मुख्य सड़क से एक ओर ,शबरी के शहर की ओर मोड़ दी ।
कुछ किलोमीटर चलकर ,सामने एक विशाल ,चौड़ी नदी दिखी ,जिसे पर करने के लिए एक बड़ा पुल था।मुझे बताया गया की यही ,छत्तीस गढ़ और उड़ीसा की जीवन दाई नदी “” महानदी “” है ।

पुल पार करते ही हमें लगा की हम किसी गांव में नही बल्कि एक बड़े से कस्बे में प्रवेश कर रहे हैं ।सड़क के दोनो तरफ शबरी से संबंधी बोर्ड ,फोटो के साथ साथ एक मंदिर की ओर जाने के संकेत लगे हुए थे ।जैसे जैसे आगे बढ़ते गए , हमें इस कस्बे के हर तरफ यात्रियों के वाहनों ,उनके पैदल चलते झुंड दिखाई देने लगे । आश्चर्यचकित से हम आगे बढ़ते रहे ,एक स्थान पर गाड़ी खड़ी की ओर पैदल ही आगे चले तो मार्ग में पूजा पाठ ,फुलवालों की दुकानें दिखाई दी । और फिर सामने दिखा ” शबरी माता जी का मंदिर “!!

मंदिर के बाहर एक बोर्ड सरकार द्वारा लगा हुआ था जिसके अनुसार यही स्थान शबरी का जन्म स्थान था ,ओर इस पर निर्मित मंदिर हालांकि आधुनिक है परंतु पुराने मंदिर के भग्नाबेश भी है जिन्हे पुरातात्विक विभाग ने सारंक्षित किया हुआ है ।

इस क्षेत्र के आसपास के निवासी इस स्थान के प्रति अत्यंत श्रद्धा भाव रखते है और उन्हें अपनी कुलदेवी भी मानते है ।

इसके अलावा मान्यता ये भी है कि इसी स्थान पर ,ऋषि मतंग ,जो की शबरी के गुरु थे ,ने शबरी की सेवा भाव से प्रसन्न हो कर आशीर्वाद दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद ,भगवान श्री राम वनवास के दौरान ,उनके आश्रम में पधारेंगे ,जिनके दर्शन से तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी ।

शबरी गुरु के वचन को ध्यान में रखते ,नित्य इसी स्थान पर ,सफाई के बाद ,मार्ग को फूलों से सजा देती थी ,साथ ही रोज ,जंगल से ,मीठे मीठे बेर चुनकर ,जो आज भी यहां ,बहुतायत में उगते हैं ,भगवान श्री राम की प्रतीक्षा करती रहती थी ।

कालांतर में ,वनवास के समय ,अनायास श्री राम इसी ,महानदी के किनारे स्थित ,ऋषि मतंग के आश्रम में लक्ष्मण सहित आए थे , और शबरी के हाथों ,जो एक भील आदिवासी महिला थी ,प्रेम पूर्वक ,मीठे मीठे बेरों को खा कर ,उसे उसी समय मुक्ति प्रदान की थी ,साथ ही स्वयं अपने हाथों से ,शबरी की चिता में अग्नि दे कर ,उसके सारे कारज किए थे ।उसी समय का ये मंदिर और ,आज भी ,इन्ही घने बेरों की झाड़ियों से घिरा हुआ ,एक छोटा सा शहर के बीचों बीच है जो शबरी के नाम से प्रसिद्ध हो कर ,” शबरी नारायण ” नाम से जाना जाता है ।

इसी शबरी नारायण शहर के ,शबरी की ,जन्म ओर मृत्यु स्थल पर बने ,मंदिर के विशाल प्रवेश द्वार से जब अंदर घुसे तो सामने के एक बहुत बड़े आंगन के ठीक बीच में एक विशाल पीपल का ,बहुत ही पुराना वृक्ष था ,जो शबरी के समय काल का ही माना जाता है ,

इसके एक ओर एक बड़ा मंदिर है जहां श्री सीता राम जी की मूर्तियां स्थापित हैं । इस आंगन के तरफ एक खंडारनुमा भवन भी था ,जिसे शबरी जी के जन्म स्थल के रूप में ,समय समय पर ,पुनर्निर्मित किया जाता रहा है,परंतु अब ये एक अवशेष रूप में ही था ,परंतु उसके चौखट पर सर झुकाने वालों की लंबी कतार लगी हुई थी ।

हम सब ने भी उनके इस पवित्र एवम ऐतिहासिक भवन के दर्शन किए ,पवित्र पीपल के दर्शन किए , और आंगन में कुछ देर बैठ कर ,मन ही मन उस समय,उस काल में, भ्रमण भी किया जब शबरी
जी ,राम के दर्शनों के लिए व्याकुल थीं ! !
इस अप्रतिम अवसर को मिलवाने के लिए हमने अपने साढू भाई को अनेकों अनेक धन्यवाद दिए , और श्रद्धा भाव से हाथ जोड़ते हुए ,मंदिर से बाहर आ कर अपने गंतव्य स्थल “” बिलाई गढ़ “” की और बढ़ चले !

जय श्री राम
( समाप्त )
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