
पिथौरागढ़ की मुख्य सड़क ,से पाताल भुवनेश्वरी जाने वाली सड़क पर मुड़ते ही समझ आ गया कि एक बार फिर से हम उत्तराखंड के सौंदर्य में डूबने वाले हैं। कैसे ,तो सुनिए , जहां ,पिथौरागढ़ की सड़क ,आते जाते वाहनों से भरी हुई थी ,वहीं इस पाताल भुवनेश्वरी जाने वाली सड़क एक दम शांत ,छोटी थी ।इक्का दुक्का वाहन ही आते जाते हमें दिखाई दे रहे थे ।काफी दूर दूर पर कभी कभार ही कोई गांव दिख जाता नही तो केवल और केवल ऊंचे ऊंचे ,जंगलों से भरे पहाड़ों की चोटियों से हमारा सामना हो रहा था ।

जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे ,मार्ग और सरपीला होता जा रहा था ।कुछ और दूर जाते ही हमारी सड़क ने घने देवदारों के जंगलों में प्रवेश किया ।ऊपर नीचे ,दाएं बाएं , जहां तक भी हम देख सकते थे हर तरफ देवदारों के ही लंबे ऊंचे ऊंचे पेड़ ,उनसे टकराते ठंडी हवाओं से ऐसी आवाज सी आ रही थी जैसे प्रकृति अपनी भाषा में, यहां रहने वाले ,भ्रमण पर आने वाले यात्रियों ,निवासियों को ,हमेशा, यहीं बसने को निमंत्रित सी कर रही हो।

हम भी प्रकृति के इन सुरीले संगीत में खोते हुई,आसपास के मनमोहक नजारों को अपनी स्मृतियों में बसाते ,मुग्ध से ,मोड़ों को , चढ़ाइयों को पार करते चले जा रहे थी।एक जगह तो इतनी मन मोहक थी कि हम रुक गए ,दोनो हाथों को फैलाया ,लगा जैसे हम इतनी ऊंचाइयों पर ,निर्बाध किसी पक्षी की तरह उड़ने को मतवाले होने जा रहें हैं।


समय की चाल ने पुनः प्राप्त हुए, हमे इस अलौकिक आनंद से बाहर आने को विवश कर दिया ।कुछ और आगे बढ़े तो अचानक सड़क के किनारे एक चाय की दुकान दिखाई दी ।इस निर्जन क्षेत्र में इसे देख ,हैरानी भरी खुशी से भर उठे ।पीछे काफी देर से हम लगातार चले ही जा रहे थे,कोई भी,कुछ भी नही मिला था ,ना कोई गांव , ना कोई दुकान ,इस लिए चाय की ये दुकान देख कर हम चाय पीने को उतावले हो उठे ।

कार रोकी,नीचे उतरे तो देखा ,इसके एक कोने में कुछ समोसे रखे है ।वाह !! मुंह में पानी भर आया । हम अभी दुकानदार से उसके यहां दुकान खोलने के बारे में जानकारी ले ही रहे थे कि ,जाने कहां से एक कार पास में रुकी ,कोई उतरा और समोसों की ततफ संकेत करके बोला ,ये सारे दे दो । चौंकते हुए हम बोले ,अरे भाई , हमें भी समोसे चाहिए ,ये हमे दे दो ! तब गौर से देखा कुल आठ समोसे ही तैयार थे ।चाय वाला असमंजस में पड़ गया ,हालांकि पहले हम उसकी दुकान पर आए थे ,लेकिन कार से उतरे व्यक्ति ने हमसे पहले समोसे की मांग उस से कर दी थी । मैने फिर कहा “” भाई ,हम बहुत दूर से आ रहें है ,बहुत दूर जाना है ,इस लिए हमे दे दो ।अब चूंकि हम चार लोग थे ,समोसे आठ ही थे , और दो दो से कम खाने पर ही समोसे का स्वाद पता नही चलता ,तो इसी लिए दो दो करके ,आठों ही मांग रहे थे ।जाने हमारी बातों में क्या था , कि कार वाले ने हमें देख ,हमारी बातें सुन , कहा ,चलिए ,ऐसी बात है तो आधे आप ले लीजिए ,आधे ही मैं ले लूंगा !! एक बार पुनः हम यहां के निवासियों के प्रति आभार से भर गए ।

चाय ,समोसे का आनंद ले ,हम फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ चले ,कुछ देर और चलने के बाद , हमें ,नीचे दूर एक बहुत बड़ा सा गांव दिखाई दिया । और आगे बढ़े तो जानकारी हुई कि ये फलाना गांव है ( दुर्भाग्य से आज मुझे उस गांव का नाम याद नहीं रहा ) ,परंतु जब उसके और समीप पहुंचे तो पता लगा कि ये कोई छोटा नही ,बड़ा गांव है ।सड़क के एक किनारे एक बड़ा , सा बोर्ड भी दिखाई दिया ,जिस पर लिखा था “” कालिका माता की जय ,चतुर्थ बटालियन कुमाऊं रेजीमेंट “” ।आश्चर्य से भरे इसे देख ,हम अपने को रोक नही सके , कार रोकी ,समीप के एक दुकानदार से जानकारी ली तो पता लगा कि यहां देवी कालिका का एक बहुत ही बड़ा ,पूरे कुमाऊं क्षेत्र में पूजनीय ,अधिकांश निवासियों की कुलदेवी के रूप में पूजे जाने वाली देवी का मंदिर है ।इसकी देख रेख भी कुमाऊं रेजीमेंट ही करती है ।इसका एक कारण और भी है कि कुमाऊं के इस क्षेत्र में ऐसा कोई गांव नही है,परिवार नही है ,जिसका कोई न कोई सदस्य सेना की इस रेजीमेंट में भर्ती नही हुआ हो ।

फिर क्या था हमने भी अपनी कार एक तरफ रोकी।,उतरे और चल दिए ,कालिका देवी के दर्शनों को ,जो ,हमारे सौभाग्य से अचानक ही हमे ,अनजाने में मिल गया था ।
मुख्य सड़क से एक सीढ़ीदार मार्ग ,सौ फुट नीचे मंदिर की ओर जा रहा था ।इस सीढ़ी की एक और विशेषता थी कि इन सीढ़ियों के दोनो किनारों पर ,छोटे बड़े ,सैकड़ों चमकते घंटे टंगे हुए थे ,साथ ही हर चार सीढ़ी के बाद एक खुला गेट बना हुआ था । पता चला कि जिसकी भी कोई मनोकामना देवी कालिका पूर्ण करती है तो आभार स्वरूप वो एक घंटा यहां टांगता है साथ ही एक गेट भी बनवाता है ।

सीढियां समाप्त होते ही छोटे छोटे मंदिरों की श्रंखला बनी हुई थी ,इन सब के दर्शन करते हुए और चले तभी सामने एक बड़े चबूतरे पर ,एक बड़ा और भव्य मंदिर दिखाई दिया ।देखा एक पुजारी पूजा श्रृंगार में लगा हुआ है ।हमे आया देख वो हमारी तरफ बढ़े ,अंदर गर्भ गृह में आने का संकेत दिया ।अंदर देखा तो सामने थी ,एक विशाल काले पत्थर की विशाल ,लाल लाल जीभ निकालती ,देवी कालिका की मूर्ति ।मूर्ति की भव्यता के आगे ,हम सब भी श्रद्धा एवम भक्ति भाव से आंख बंद कर के उनका ध्यान करने लगे ।पुजारी जी ने हमे मंदिर का इतिहास एवम महत्व बताते हुए हमारी पूजा सम्पूर्ण की ।
फिर से सीढियां चढ़ , कार में बैठ चल दिए अपनी आगामी मंजिल , पाताल भुवनेश्वरी की ओर ,जो लगभग एक घंटे की दूरी पर आगे थी ।
सड़क , छोटी सी ,बलखाती ,जंगलों में निकलती ,हमे ,आगे ले जा तह थी ।इसी तरह चलते कोई डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद ,अचानक सड़क ,दो या तीन घरों के आगे समाप्त सी हो गई ।दो चार दुकानें ,भी चाय नाश्ते की थी।हमने जब पाताल भुवनेश्वरी की गुफाओं के बारे में पूछा तो एक ने बताया कि ,आप को तीस मीटर आगे ,वो जो रास्ता दिखाई दे रहा है ,इस पर पैदल ही जाना होगा ।

जैसे ही पैदल मार्ग पर चले हमें दिखाई दिया एक ,सफेद रंग का छोटा सा गेट ,जिस पर लिखा था “” पाताल भुवनेश्वरी मंदिर “” ,साथ ही उसके नीचे एक छोटी सी घंटी भी टंगी थी ।उतावले से ,हम ,उस और तेजी से कदम बढ़ाने लगे , और क्यों ना बढ़ाए ,दिल्ली से करीब साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर ,अत्यंत ही दुर्गम ,कठिन ,रास्तों को पार करते ,हम यहां तक आ पाए थे ।
गेट के अंदर घुसते ही ,बाएं हाथ को एक छोटी सी कोठरी बनी थी ,जिसमे मंदिर समिति का नाम लिखा था ,साथ ही बीस रुपए की टिकट भी लेने का बोर्ड लगा था ।उस कोठरी के ठीक बगल में न एक सफेद रंग से पिता एक दरवाजा था ,जिसमे नीचे जाती सीढियां दिखाई दे रही थी ।इस गेट के आगे फिर एक बड़ा सा हाल था ।ये सब एक लाइन में ही बने थे ,इनके दूसरी ओर कोई आठ फुट का पक्का गलियारा था ,जिसके किनारे लोहे की जाली लगी थी , और उसके बाद थी ,गहरी घाटी, जो नीचे घने जंगलों में कहीं खो सी रही थी ।गुफा के ठीक ऊपर हरियाली से ढकी पहाड़ियों की चोटियां दिखाई दे रही थी ।
गुफा के लिए जब टिकट ली तो टिकट देने वाले ने पूछा कि क्या आप कोई गाइड लेंगे ,सिर्फ पचास रुपए उसका मूल्य है ।मेरी एक आदत है , ऐतिहासिक या दर्शनीय स्थलों में घूमते समय , मैं गाइड की सेवाएं अवश्य लेता हूं ।इस से हमे उस स्थान की अभीष्ट जानकारी मिलती है ,जबकि लोग ,बहुत खर्च करके ,इन स्थानों पर , गाइड की सेवा नही लेते है ,उनकी दृष्टि में ये बेकार का खर्च होता है !!
पाताल भुवनेश्वरी की गुफाओं में नीचे प्रवेश से पहले सोचा ,एक बार और , बाहर से इसका जायजा ले लेते है ।गुफा के बाहर केवल एक दस फुट ही चौड़ा पक्का ,ग्रिल से सुरक्षित गलियारा था ।ये पूरा परिसर चारों ओर से घने जंगलों से भरा हुआ था हमारे ऊपर और नीचे बड़े बड़े विशाल हिमालई पहाड़ ,जंगलों से ढके हुए थे ।केवल एक और चार फुट चौड़ा रास्ता ,उस सड़क को जोड़ रहा था जहां से हम आए थे ।नितांत एकाकी ,निर्जन क्षेत्र में ये गुफा थी ।
गुफा के मुहाने पर एक इतना छोटा दरवाजा था ,जिसमे केवल सिर झुका कर ही अंदर प्रवेश किया जा सकता था ।नीचे झांका तो प्राकृतिक पत्थरों को काट काट कर ही आठ दस सीढियां सीधे नीचे जा रही थी ।इसका मुहाना इतना छोटा ,एवम सीढियां की ऊंचाई इतनी अधिक थी कि हमारे एक साथी महेंद्र भाई ने इसमें प्रवेश करने से ही इंकार कर दिया ।बोले , मैं तो बाहर से ही इसको देख कर संतुष्ट हो जाऊंगा ,आप ही अंदर जाएं !
पहली सीढ़ी पर पैर रखते ही समझ आ गया कि उन्होंने सही निर्णय लिया था ।ये इतनी खड़ी थीं कि इन पर बैठ कर ही नीचे जाया जा सकता था ।साथ ही एक किनारे पर लोहे की जंजीर भी नीचे तक जा रही थी ,जिसे पकड़ कर ही हम नीचे उतर पाए ।अंदर घनघोर अंधकार से बचने के लिए लाइटें लगी हुई थी ।खड़ी सीढ़ी उतरते ही सामने एक बड़ा ,ऊबड़ खाबड़ गलियारा दिखाई दिया ।उस पर पैर रखते ही प्रतीत हुआ ,यहां पानी सा बह रहा है ।इसके तीनों और चौड़े पतले ,बड़े बड़े रास्ते जाते दिखाई दे रहे थे ।
अब गाइड महोदय का काम आरंभ हो गया ।हाथ में पकड़ी टॉर्च की मदद से वे,गुफा में उभरी ,प्राकृतिक संरचनाओं पर फोकस डाल कर हमे उनके बारे में बताने लगे ।
उनके अनुसार ये संपूर्ण ब्रह्मांड का मूर्ति रूप में निर्माण है ,जिसे स्वयं ईश्वर द्वारा निर्मित किया गया है ।उनके अनुसार कहीं शिव परिवार की मूर्तियों का आभास प्रतीत होता था ,तो कहीं पांडवों का तो कहीं इंद्र आदि देवताओं का ।एक स्थान पर तो उन्होंने हमे , हमारी आकाश गंगा का प्रतिरूप दिखाया ।कहीं हंस तो कहीं गणेश जी का आभास ,तो कहीं हाथी की सूंड की तरह आकर ! ये समझिए , कि इस तीन सौ फुट के करीब लंबी ,एवम कहीं संकरी तो कहीं चौड़ी,विभिन आकर को वे हमे काफी अंदर तक दिखाने ले गए ।एक स्थान पर तो शिव लिंग भी स्थापित था ,जो उनके अनुसार आदि शंकराचार्य जी ने अपने हाथों से स्थापित किया था ।हम सब तो प्रकृति के इन अद्भुत रचनाओं का आनंद ही लेते रहे ।

इस गुफा के अंदर , टेढ़ी मेढी दीवारों पर ,जिधर भी दृष्टि पड़ती ,उधर ही प्राकर्तिक रूप से बनी ,विभिन्न ,अनेकों आकृति ,बरबाद ही हमारा ध्यान खींच लेती ।कभी प्रतीत होता ,ये विशाल हाथी की आकृति तो कभी हंस तो कभी अनेकों ऐसी आकृति ,जिनके लिए कोई भी नाम नही सूझता था ।गाइड के अनुसार कभी आकाश गंगा की तरह छोटे छोटे तारे तो कभी विभिन्न देवी देवताओं की आकृति पत्थरों में जैसे ढली हुई थी ।इस गुफा में हर कुछ दूरी पर अन्य गुफाओं की ओर जाने के निशान थे ,परंतु प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से उन्हे बंद करवाया हुआ था ।
ये सब इतना अद्भुत ,अलौकिक था कि मन ये मानने को ही तैयार नहीं था कि ये सब कुछ प्राकर्तिक निर्मित है ।सच कहूं ,इस गुफा में चूंकि कैमरा अथवा मोबाइल ले जाना मना था ,अन्यथा आप सब भी मेरी उपरोक्त बातों से शर्तीय सहमत ही नही , अपितु विस्मित भी होते ! !
कभी कभी हमारा पढ़ा लिखा दिमाग ,गाइड की बातों से असहमत भी होता ,परंतु ये भी वास्तविकता थी कि भले ही यहां तक पहुंचने के लिए , हमें काफी समय ,काफ़ी दिन तथा अत्यंत दुर्गम मार्ग पर चलना पड़ा ,फिर भी विशाल पहाड़ के नीचे ,छोटे से प्रवेशद्वार के अंदर ,इतनी अद्भुत ,विविध ,प्राकृतिक रचनाएं निर्मित थी , एक बार तो यहां आना बनता ही था ,इस लिए हमारा यहां शायद इतने कष्टों के बाद भी सार्थक भी हो गया !
गुफा से बाहर निकल ,इतनी अद्भुत दृश्य दिखाने के लिए गाइड महोदय को धन्यवाद दे कर ,हम , कार में बैठ पुनः अपनी आगामी मंजिल ,जो कि अस्सी किलोमीटर की दूरी पर थी ,मार्ग एक दम विरल ,”” ग्वालदम “” की और !!

( क्रमशः……भाग : ग्वलदम )
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