पिथौरागढ़ पहुंचते पहुंचते रात के नो बज गए ।दिन भर के थके मांदे ,भूखे ,सब से पहले हमने जो भी ढंग का होटल देखा ,घुस गए ।हाथ मुंह धो ,नजदीक के किसी भी खाने के होटल को ढूंढने निकल पड़े ।थोड़ा इधर उधर भटकने के बाद दो, खाने के होटल दिखाई दिए ।हमने अपनी कार उसके सामने लगाई जो थोड़ा अच्छा सा लगा, तो घुस गए ,अंदर।होटल के बाहर रिसेप्शन का काउंटर ,फिर एक लंबा सा हाल ,जिस में आठ दस मेज कुर्सी पर कुछ लोग बैठे हुए थे । इसी हाल के बीच में से एक किनारे से ऊपर सीढियां जा रही थी , जहां ऊपर के हिस्से में सजी मेज कुर्सियां पर भी कुछ लोग बैठे हुए थे ।

एक खाली मेज कुर्सी पर बैठते बैठते हमें लगा कि इस होटल में खाना कम ,पीने पिलाने का काम अधिक हो रहा था ।लेकिन , हमें क्या ,हमने काउंटर पर खड़े आदमी को बुलाया और कहा कि जल्दी से हमारे खाने का इंतजाम करे ।हां में सर हिलाते वो चला गया ,ओर उसके जाते हीं एक साधारण से कपड़े पहने वेटर हमारा ऑर्डर लेने आ गया ।हमने उसे ऑर्डर दिया , और कहा कि जरा जल्दी करना ।इसके बाद हम चारों अपनी भूख को भूलने के लिए, आज हमारा हमारा दिन कैसा बिता, इसी बात चीत में व्यस्त हो गए ।कुछ ही देर में हमारी मेज खाने से भर गई ।दो चार निवाले खाने के बाद ,कुछ चैन पड़ते ही हम ने आपने आस पास का जायजा लेना शुरू किया तो हमने ध्यान दिया कि जो होटल हमारे आने से पहले ,ऊपर नीचे लगभग भरा हुआ था ,वो एक दम खाली हो गया था । हमारे अलावा अब वहां कोई भी नही था । खैर ,हमे क्या ,हम तो दिन भर की अपनी भूख मिटाने में लगे थे ।

भोजन के बाद हमने वेटर से बिल लाने को कहा तो ,काउंटर पर खडा ,आदमी हमारे पास आया और बोला।”” सर ,रहने दीजिए ,रहने दीजिए “” हम चौंके ,क्यों भाई ,तो वो चुप चाप ही खड़ा रहा ।आखिर कार हमने उसे जोर से बिल लाने को कहा तो वो बिल लाने के लिए चला गया ।उसकी इस हरकत से हम चारो सोच विचार में पड़ गए ।सबसे पहले मैं ही बोला ,देखा ,उत्तराखंड के लोग कितने मेहमान नवाज होते हैं ,तभी मेरे मित्र जे पी भाई बोले ,”” भाई साहब मुझे लगता है इन्होंने हमें शायद बाहर के पुलिस वाले समझ लिया है ,आपने गौर नही किया कि जब हम यहां आए तो इस होटल में अधिकांश पीने पिलाने में लगे हुए थे ,मगर हमारे आने के तुरंत बाद वे सब नदारद हो गए”” । ओह ! अब समझ में आया उसके ,हमसे बिल नही देने की बात का अर्थ ।चूंकि भाषा और वेश भूषा से हम लोकल नही दिखाई दे रहे थे ,हमारी गाड़ी का नंबर भी बाहर का था ,इसके साथ एक बात और ,हमारे एक साथी ,महेंद्र भाई , डील डोल से ही नही ,शकल से भी पुलिस ही लगते हैं ,इस लिए हम सब के आते ही इस होटल की हालत में बदलाव हो गया था ।हम सब मुस्कुराते हुए ,बिल पे कर के उठे ,बाहर खड़ी कार में बैठे ,जैसे ही कुछ आगे बढ़े ,हम जोर के ठहाके लगाने में व्यस्त हो गए !!

सुबह ,तरोताजा हो उठ कर ,होटल छोड़ ,पिथौरागढ़ घूमने निकले ,तब समझ आया ,ये तो बहुत ही बड़ा शहर है ,लगभग देहरादून की ही तरह ।देहरादून के ही समान ये शहर भी मध्य हिमालय में बड़ा हुआ है । आधा शहर तो ऊंची नीची पहाड़ियों पर ,तथा आधा शहर ,कुछ समतल सी ढलानों पर बसा हुआ है ।बहुत ही व्यस्त , बाजार ,ट्रैफिक की भरमार ,शोर गुल ,भीड़ भाड़ से भरपूर इस शहर में ,जल्दी ही हमें समझ आ गया कि यहां टूरिस्ट के घूमने के लिए कोई विशेष आकर्षण नही है ।पिथौरागढ़ की भौगोलिक परिस्थितियों ने ही इसे इतना बड़ा बनाया है ।प्रसिद्ध हिल स्टेशन ” मुंसियारी ” के साथ ही अन्य कई हिल स्टेशन जैसे ग्वाल दम ,अल्मोड़ा ,नैनीताल ,होते हुए दिल्ली तक जाने के लिए, जिसमे दो दिन और एक रात लगती है ,इसका राजमार्ग , उत्तराखंड के अन्य राजमार्गों से अधिक अच्छा बना हुआ है , इसके भी कारण एवम , एक बहुत ही पुरातत्व महत्व का स्थान “” पाताल भूवनेश्वरी “” भी इसी से कोई पचास किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण ,पिथौरागढ़ अधिक प्रसिद्ध है। हमे यहां आकर एक और विशेष बात पता लगी कि नेपाल देश के पश्चिमी हिस्से से भारत आने के लिए पिथौरागढ़ ही सब से सुविधाजनक सीमा का शहर पड़ता है ।नेपाल एवम भारत की सीमा पर बहती काली नदी ही इन देशों को अलग करती है ,साथ ही इस काली नदी पर बना एक लोहे का बना बहुत पुराना पुल ,इन देशों को आपस में जोड़ता भी है ।

कुछ घंटे यूं हीं हम ,इस शहर में घूमते रहे , फिर निर्णय लिया कि अब “” पाताल भूवनेश्वरी “” गुफाओं को देखने के लिए ,आगे बढ़ लेते हैं ।अभी सुबह के ग्यारह ही बजे थे,आशा थी कि हम दोपहर एक बजे तक वहां पहुंच जायेंगे !

पिथौरागढ़ से निकले हुए हम कुछ ही दूर चले थे कि हमने अपने को बहुत ही ऊंचे हिस्से में पाया।देखा ,हमारी सड़क ,बलखाती , दाईं ,बाईं मुड़ते ठीक बहुत नीचे ,बहती काली नदी के किनारे पहुंच रही है ।सड़क ,आते जाते वाहनों ,जिनमे रोडवेज की बसें काफी अधिक संख्या में थी ,उनमें से अधिकांश में ,दिल्ली का बोर्ड लगा हुआ था ।फिर हमने गौर किया कि उनमें बैठे अधिकांश यात्री नेपाली भी थे , और लगभग सभी के माथे पर तिलक भी लगा हुआ था ।शायद उनके परिजनों ने लंबी यात्रा की कुशलता के लिए ही लगाया होगा ।

अभी हम कुछ किलोमीटर ही चले थे कि अचानक हमने देखा कि सड़क पर यातायात रुका हुआ है ।किसी तरह ,मुड़ते मुड़ाते ,हम अपनी कार को काफी आगे तक कोई ,डेढ़ किलोमीटर तक ,ले गए ,फिर रुकना ही पड़ा ।नीचे उतर पूछ ताछ की तो पता चला कि कुछ देर पूर्व ,पहाड़ के खिसकने से सड़क पर मलबा आ गिरा है ,जिसको हटाने के लिए काम चल रहा है और अभी दो घंटे के करीब और समय लगेगा ।निराश ,परेशान ,कोई अन्य चारा नही होने के कारण ,हम भी सैकड़ों अन्य लोगों की तरह शांत बैठ गए ।समय पास करने को , मैं , कार से नीचे उतर ,पैदल ही कुछ आगे बढ़ा तो देखा कि इस जाम का फायदा उठा ,किसी नजदीकी गांव वाले ने ,टेंपरेरी ,पकोडों की दुकान सी खोल ली है ।अब ,पहाड़ों का खुशनुमा मौसम ,हल्की ठंडी हवा ,जिसमे अब गरम पकौड़ों की खुशबू समाई हुई थी ,मुझे मजबूर कर दिया , कार में बैठे अपने मित्रों को भी यहीं बुलाने को ।वे भी फालतू ही बैठे थे ,इस लिए तुरंत आ पहुंचे ।फिर क्या था ,हम थे और हमारे हाथों में थे गरमा गरम पकड़ों की ,कागज की प्लेट ,साथ में हरी चटनी , और कुछ साबुत हरी मिर्च ।सच कहता हूं ,इस स्वाद को शायद ही हम सब में से कोई भूला होगा ।कुछ ही देर में हमारी तरह पकड़ों का स्वाद लेने ,इंतजार करते लोगों की अच्छी खासी भीड़ वहां जमा हो गई ।
डेढ़ घंटे बाद ज्यों ही मार्ग एक खुला ,हमने अपनी कार तेजी से ,आगे बढ़ा दी !
और दो घंटे की यात्रा के बाद ,एक मोड़ पर करते ही ,इस सड़क से एक अन्य सड़क निकलती दिखाई दी ,किनारे बोर्ड भी लगा था “” पाताल भुवनेश्वरी 45 किलोमीटर “” ।फिर क्या था ,हमने भी उधर का हो रुख कर लिया ।
( क्रमशः :: शेष अगले भाग में )
टिप्पणी करे