यात्रा ……..उत्तराखंड ( भाग : पांच)

     

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कपकोट कस्बा ,जो की बीस किलोमीटर की दूरी पर था ,सड़क की  ऊंचाई थोड़ी कम थी ,कुछ कुछ दूरी पर गांव आदि भी दिखाई दे रहे थे ,सरयू नदी भी हमारे साथ साथ बह रही थी ,पर जैसे ही कपकोट कस्ब से हम आगे बढ़े ,अचानक हमारे आस पास के भू दृश्य बदलने लगे ।सरयू नदी भी एक मोड़ पर हमसे विदा हो गई ।सड़क भी ऊंचाई की ओर मुड़ गई ।वन क्षेत्रों की अधिकता के साथ ,आबादी क्षेत्र भी रिक्त होते चले गए ।अभी कुछ और दूर चले थे कि हमारी सड़क अचानक सरपीली रूप ले ,घने देवदारों के जंगलों में सिमट गई ।हमारा सामना अब तेज चढ़ाई से होने लगा ।कुछ और दूरी पर चलते ही हम विशाल ,पहाड़ी चोटियों के मध्य पहुंच गए ।इतना वीरान मार्ग था कि पूरे दो घंटों के सफर में हमे कोई भी वाहन ,घर ,कुछ भी नही मिला ।मार्ग इतना संकरा ,टेढ़ा मेढा , कि चालक ,आसपास के नजारे देखने की हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था ।प्रत्येक एक फुट पर ,सड़क मुड़ ही नही जाती , और ऊंची हो जाती ।इस लिए कुछ कुछ दूरी पर ,हम नजारे देखने के लिए ,ड्राइविंग सीट बदल देते ।चढ़ाई के साथ साथ घने वनों में होने के कारण वैसे भी काफी कम रोशनी होने लगी थी ।चलते चलते अचानक हमने देखा कि सूर्य देवता भी दिन भर की हमारे साथ की यात्रा से विश्राम लेने के लिए अस्त होने की तयारी करने लगे ,तो एक मोड़ पर हमने भी अपनी कार खड़ी कर दी ।हम सब इस अविस्मरणीय सूर्यास्त को देखने में खो गए ।हम इस समय ऊंची ऊंची पहाड़ियों से घिरे हुए थे ।

   

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 कुछ ही देर में ,अंधेरा छा गया , कार की लाइट ऑन कर ,हम आगे बढ़ चले ।कुछ देर और चलने पर हम परेशान से होने लगे कि रात्रि विश्राम के लिए कोई गांव ,होटल ,किसी का नामोनिशान नहीं दिख रहा था । विरल जगह होने के कारण ,नेट नही होने के कारण  ,गुगल मैप भी हमारी पहुंच से दूर हो गया था। सड़क जरूर ढंग की थी ,परंतु आगे की दूरी ,क्षेत्र बताने के लिए ,किनारे कोई भी बोर्ड या मील के पत्थर नही लगे थे ।अंधेरे में चलते चलाए हमने  अचानक अपने को  किसी पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर पाया ,आगे मोड़ पर जैसे ही मुड़े ,दो बातें हुईं ।एक तो सड़क कुछ ढलान पर मुड़ी ,दूसरे हम ,देवदारों के वृक्षों की जगह ,चौड़े पत्ते वालें वृक्षों के  ,जंगली बेलों से लदे, जंगल में जा पहुंचे ।ये इतना घना था कि कार की लाइट के अलावा कुछ और  नही दिखाई दे रहा था ।तभी सड़क किनारे एक छोटा ,धुंधला सा मील का पत्थर दिखाई दिया “” शामा “” बीस किलो मीटर ! फिर दो बातें हुई ,एक तो चलो किसी जगह का पता तो चला ,दूसरे इस अंधेरी रात में ,पहाड़ों की सड़कों के हिसाब से ,बीस किलोमीटर की दूरी पार करने में, मैदानों के हिसाब से सौ किलोमीटर की दूरी के बराबर समय लगता है ,पर ,कोई अन्य उपाय नहीं ,इस लिए  घने अंधेरे ,घने जंगलों ,मोड़ों तोड़ों से जूझते ,चलते रहे ,चलते रहे ।

     करीब रात के साढ़े आठ बजे के लगभग ,जैसे ही हमारी कार ने एक मोड़ काटा ,सामने दिखाई दिए ,रौशनी से भरपूर कुछ घर ।तभी एक बोर्ड भी नजर आया “” शाम “” ।एक छोटी सी अधखुली दुकान के आगे हमने कार रोकी ,तो दुकान का गेट बंद करता दुकानदार भी हमे देख रुका ।”” क्या रात रुकने के लिए कोई होटल है क्या ,होटल तो नही।,हां ,मेरा हम स्टे है “” ,सुनकर जो खुशी हम सबको मिली ,सच कहूं ऐसा कहा जैसे ,”” कौन बनेगा करोड़पति “” की फोन काल आने पर मिलती !! 

     

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दुकान बंद कर ,हम उसके पीछे ,मुख्य सड़क से बाईं ओर ,पचास फुट की तीव्र ढलान की ओर मुड़े ।गेट पर एक बड़ी सी बल्ब की रौशनी के आगे कार रोकी ,पहिए के आगे पत्थर की टेक लगाई ,देखा कि ये तीन मंजिला पक्का घर है।एक मंजिल ऊपर ,सड़क के लेबल में ,प्रवेश द्वार के बगल में उसकी किचन ,नीचे तीसरी मंजिल पर उसका होम स्टे का हाल ।नीचे उतर ,जब हाल में घुसे तो जैसे दिन भर की हमारी थकान ,हमारे ऊपर हावी होने लगी ।एक कतार में चार तख्त ,उन पर मोटे मोटे गद्दे ,साथ में मोटी मोटी रजाई ,फिर क्या था ,सीधे बिस्तरों पर ढेर हो गए ।” क्या भोजन खिलाएंगे “” उसके हां कहते ही ,हम बाथरूम जो कि आधुनिक सा ही था ,मुंह हाथ धो कर ,थकान मिटाने लगे ।

     

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 आधे घंटे में ही हमारे मेजबान ने हमें भोजन  परोस दिया ।सुबह के भूखे थे ,पर जब भोजन का प्रकार देखा तो भूख और तेज हो गई ! पूरा उत्तराखंडी भोजन ,लाल रंग के मोटे चावल , लाल रंग की रागी के आटे के मोटे मोटे ,घर के सफेद मक्खन की डली,  लोकल पत्तेदार सब्जी ,आलू के साथ भी कोई लोकल हरी सब्जी और प्याज ,वाह ,अत्यंत स्वादिष्ट ।खाना तो भड़िया था ही  , खिलाने वाले के प्रेम भरे आग्रह से और स्वादिष्ट हो गया !

      भोजन के पश्चात ,उनसे थोड़ी रस्मी बात करते करते ,जब हम सब आंख मूंदने लगे ,तो सुबह जल्दी मिलेंगे , उनके कहते ही ,हम चारों बिस्तर पर ढेर हो गए !

        शेष ..क्रमश 😦 भाग .. छः में )

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