यात्रा ……. उत्तरा खंड :: घनसाली शहर

      सुबह सुबह आंख खुली ,हमारे आसपास ही गूंजती , चहचहाती पक्षियों की मधुर चहचहाटो से । ये इतनी विविध और मधुर थी , कि अल सुबह ,रजाई छोड़ ,कमरे के बाहर निकल आया ।देखा ,सामने एक खुला बरामदा है।जब कदम उधर बढ़ाए ,तो नजारा देख आंख खुली की खुली रह गई ।ठीक एक दम सामने थे विशाल ,ऊंचे ,बड़े बड़े ,हरियाली से भरे ,ढेर सारे पहाड़ , एक एक जिनकी  चोटियां स्वर्ण जैसी आभा से दमक रही थी ,  कारण था ,हमारे होटल के पीछे उगता सूरज ! इस वातावरण को और अद्भुत बना रहा था पक्षियों का कलरव । बरामदे के किनारे से जब नीचे झांका तो गजब दृश्य दिखाई दिया ।

ठीक कुछ ही फुट नीचे शांत लेकिन काफी चौड़ी ,टेढ़ी मेढी ,शांत भाव से बहती “” अलकनंदा “” नदी ,जिसे हम “” गंगा “” नदी ही मानते हैं।सामने पर्वत के ऊपर बेतरतीब बसे ,कई सारे छोटे मोटे गांव ,सीढ़ीदार खेत ,ओर इन तक पहुंचने के लिए बना एक झूला ,लोहे के तारों से बुना पुल ,बिल्कुल ऋषिकेश स्थित लक्ष्मण झूले की तरह ।

सच कहूं तो इस स्थान के सौंदर्य का अनुभव ,तब ही महसूस कर सकते हैं ,जब आप प्रत्यक्ष रूप से उसका एक हिस्सा  बनें !! सौभाग्य से हमारी यात्रा के इस प्रथम चरण ने हमारे हृदय पर इतना अधिक प्रभाव डाला कि हम ना केवल ,इस बेकार से होटल में बिताई रात के अनुभव को भूल गए अपितु आगे करने बाली यात्राओं के लिए उत्साहित हो गए ।कुछ देर शांत खड़े हो ,इन सब स्वर्गीय सुख का आनंद ले ,पीछे मुड़ के देखा तो मेरे शेष साथी भी ना जाने कब उठ कर ,मेरे साथ ही इसका अनुभव ले रहे थे ।

       नाश्ता कर ,तरोताजा हो ,हम जल्दी ही अपनी आगामी यात्रा के पड़ाव पर चल दिए ।अब हमारी कोई निर्धारित मंजिल तो थी नहीं  ,जिधर मन करेगा ,उधर ही रुकेंगे ,ये निश्चय कर के ही तो हमने ये हिमालय की यात्रा आरंभ की थी ।

     

हरियाली से भरपूर ,शांत ,बलखाती सड़क ,आसपास ऊंचे नीचे बसे, छोटे छोटे ,पहाड़ी गांवों को निहारते ,गंगाजी के साथ साथ चलते ,शीतल ,स्वस्थ प्राणवायु को पीते ,लगभग दस बजे के आसपास एक बड़े से शहर की झलक दिखी ।मार्ग में लगे बोर्डों से पता चला हम “” घनसाली “” शहर के किनारे आ पहुंचे है ।हमारी कार अभी काफी ऊंचाई पर थी ।शहर काफी ही नीचे ,झरनों की तरह ,मगर शांत बहती गंगा नदी के दोनो किनारों पर बसा था।कुछ ही समय में हमने प्रवेश किया “” घनसाली “” शहर के अंदर !

       

पहले आपको इस घनसाली शहर के बारे में बताते हैं ।कई वर्षों से मैने देखा था कि दिल्ली ,देहरादून ,हरिद्वार ,हल्द्वानी आदि शहरों से बहुत सारी बसे “” घनसाली “” लिखे बोर्ड के लिए चलती है।तभी से मेरे मन में उत्सुकता थी कि आखिर इतनी सारी बसें इस घनसाली नामके शहर के लिए क्यों जाती है ।इसी  कारण मैने उत्तराखंड की यात्रा में इस घनसाली शहर जाने ,देखने का प्रोग्राम बनाया था।आज जब हम इस शहर में हम आ पहुंचे हैं तो तुरंत ही इस प्रश्न का उत्तर मिल गया ।घनसाली पूरे उत्तराखंड के ठीक बीचों बीच स्थित है ।ये शहर गंगा नदी के दोनो ओर बड़ा हुआ है ।देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ जो कि नेपाल सीमा पर ,उत्तराखंड का अंतिम शहर है  ,उसके ठीक मध्य में होने एवम सैकड़ों मीलों तक इसके अलावा अन्य कोई बड़ा शहर नही होने के कारण तथा ,आपने आसपास कोई एक हजार से अधिक ,दूर दूर ,विषम स्थानों पर बसे गांवों के निवासियों के लिए ,शेष भारत से जुडने के लिए ,इसी शहर में साधन उपलब्ध है।शायद मेरी ये सोच से आप पूरी तरह तभी सहमत होंगे ,जब कभी उत्तराखंड की मेरे जैसी यात्रा कर , इसको स्वयं महसूस करें ! 

     

 खैर , जब हमारी कार ने इस शहर में प्रवेश किया तो सबसे पहले इसकी बनावट पर मुग्ध हो गए ।नदी के दोनो तरफ बने इस शहर का सौंदर्य ,नदी एवम बड़े बड़े पहाड़ ,खूब बढ़ा रहे थे ।इसके मुख्य बाजार जो कि दो किलोमीटर से भी अधिक लंबा था ,उस से इसके एक और कई सारे छोटे छोटे बाजार बड़े हुए थे ।दूसरी ओर तो नदी बह रही थी ।आबादी भी लगभग दो लाख से अधिक थी जो कि उत्तराखंड के हिसाब से बहुत मानी जाती है।क्या नही था इस शहर में ।कई पेट्रोल पंप ,सिनेमा हाल।, होटल्स,बड़े बड़े शो रूम ,तीन चार बड़े स्कूल ।यही सब देखते ,हम बड़े बाजार में आगे बढ़े जा रहे थे ।दोनो तरफ खूब चहल पहल ,रौनक थी ।कुछ देर बाद हम नदी पर बने,लोहे के एक पुल पर पहुंचे ।शायद यही इस शहर का अंतिम छोर था ।पुल के इस पार ,सड़क दो भागों ,दाईं एवम बाईं में बंट रही थी ।

पुल पार ,थोड़ी आबादी ही थी ।हम नदी के झरने नुमा बहाव को देखने उतरे तभी मेरी दृष्टि पुल के ठीक पार ,एक विचित्र दृश्य पर टिकी ।जैसा कि मैने बताया ,पुल के पार , सड़क दो भागों में बंट गई थी तो इनके ठीक सामने कोई बीस फुट की ऊंचाई पर ,पहाड़ी के ऊपर ,तांबे के रंग में ,एक लंबे चबूतरे पर बनी,उत्तराखंड के महत्व पूर्ण नेताओं की आधी आधी मूर्ति बहुत ही शानदार दृश्य पेश कर रही थी ,  तभी मैने गौर किया की ,इन मूर्तियों के ठीक नीचे बीच में भी किसी साधारण आदमी की ,साधारण कपड़ों में ,साधारण रंग में एक मूर्ति बनी हुई है ।ये इतना प्रभावशाली दृश्य था कि मैं इसको अपने कैमरे में कैद करने से नहीं रोक सका । कार से उतर ,पुल के ठीक बीच ,जब मैने फोटो खींचने को कैमरे को फोकस किया ,तभी मुझे लगा कि,नीचे ,बीच वाली मूर्ति कुछ हिली !! मुझे यकीन नही आया ,क्या वास्तव में ये मेरा भ्रम तो नहीं , मैने पुनः केमरे को इस पर जूम किया तो मै पूरी तरह हैरान रह गया ।वो मूर्ति नही थी ,अपितु , मैले कुचेले कपड़े पहने ,कोई विक्षिप्त भिखारी बैठा था । आश्चर्य चकित मुझे  सदमा सा लगा ।जिन महानुभावों की मूर्ति ,उत्तराखंड के विकास को दिखाने के लिए लगाई गई थी ,ठीक उनके नीचे ,बीच में बैठा विक्षिप्त ,इस सबकी पोल ही नही खोल रहा था ,अपितु ,वहां की सरकार के मुंह पर एक तमाचा भी जड़ रहा  था ।ना उस भिकारी को अपने सामने ,आसपास की दुनिया से कोई फरक पड़ रहा था ,ना ही उसके आसपास निकलते वाहनों ,जनता पर कोई फर्क पड़ रहा था ।ये इतना मार्मिक दृश्य था कि उसके सामने “” घनसाली “” शहर की सारी सुंदरता से हमारा मोह भंग हो उठा ।हमने अपनी कार मोडी ,ओर शहर से बाहर ,अपनी आगामी यात्रा की ओर रुख कर लिया ।

       

शहर के बाहरी छोर ,पर एक , ढाबे नुमा दुकान पर भर पेट नाश्ता किया ,गुगल मैप की सहायता से अपनी आगामी मंजिल “” बागेश्वर “” शहर को मापा ,ओर बढ़ चले उस और !

     

अभी हम कुछ ही दूर चले थे कि हमने गौर किया कि हम लगातार ऊंचाई की ओर बढ़े जा रहे हैं।आबादी के साथ साथ ,पहाड़ों पर हरियाली के स्थान की जगह लंबे लंबे ,देवदारों के घने वृक्षों ने ले ली थी ।सड़क भी संकरी सी होती जा रही थी ।लगातार मोड़ ,तोड़ ,चढ़ाई , निरवता के साथ हम घने जंगलों में ,ऊंची ऊंची पहाड़ियों से घिरे ,लगातार ऊंचाई की ओर बढ़े जा रहे थे ।

आसपास के प्राकृतिक दृश्य इतने मोहने वाले हो गए थे कि शीघ्र ही हम घनसाली शहर के शोर गुल को भूल गए ।हम सब, इस वक्त, पूरी तरह ,प्रकृति के इस सौंदर्य में रमने लगे थे । जैसे जैसे हमारी यात्रा आगे बढ़ती जा रही थी , वैसे वैसे ही आसपास की दृशायवाली और मन मोहक होती जा रही थी ।

कोई दो घंटे की यात्रा के पश्चात एक स्थान का सौंदर्य इतना हमे मनमोहक लगा कि हमने अपनी कार को एक किनारे रोक दिया ।नीचे उतर सच कहता हूं हम सब शायद मन मस्तिष्क से इसकी सुंदरता को अपनी स्मृतियों में सहेजने से लगे थे । सड़क के किनारे खड़े घने देवदारों के बड़े बड़े वृक्षों को देख ,हम सबके अंदर का बालपन जाग उठा ।

बस फिर क्या था ,हम सब बच्चों की तरह सड़क किनारे खड़े उन वृक्षों पर चढ़ने , झुलने का आनंद लेने लगे ।इन सब में इतना मजा इस लिए भी और आ रहा था कि हमारे आसपास कोई और ही नही था ।

     

कुछ देर यू हीं हम सब कुछ विस्मृत कर प्रकृति का ही अंश बनते रहे ।

तभी हमारे साथी ने याद दिलाया ,भाई जी दोपहर  के दो बज गए है ,आगे बहुत दूर जाना है ।प्रफुल्लित मन से हम सब फिर अपनी यात्रा पर बढ़ चले ।फिर वही दृश्य ,वही मंजर ,कभी एक दम ऊंचाई ,तो कभी तेज ढलान ,चारों ओर हरे भरे देवदार के जंगल ,मदहोश से ,सुध बुध खोए इसी तरह हिमालय के आंचल में चैन से भरे ,ना जाने कब चलते चलते फिर एक बड़े शहर के किनारे पहुंचे ।ये था “” बागेश्वर “” शहर !

   

  ये शहर भी उत्तराखंड के अन्य शहरों की ही तरह नदी के किनारे दोनो तरफ ,ऊंची नीची ,पहाड़ियों से घिरा ,लेकिन काफी बड़ा  था।शाम के चार बजने को आए  थे ,बलखाती सड़कों ,मोड़ों से शरीर पूरी तरह लस्त हो चुका था ,इस लिए एक अच्छी सी चाय की दुकान के आगे रुके ।”” भाई ,बढ़िया करेंट वाली चाय बनाना”” ,ये कह कर कार से उतर आस पास के नजारे देखने लगे ।विशाल ,चौड़ी नदी ,लेकिन झरने की तरह उथली ,बीच में छोटे बड़े पत्थर से टकराते पानी से एक बड़ी ही मधुर ध्वनि ,हमारी कानों को बड़ा ही सुख दे रही थी ।

उत्तराखंड के शहर स्वयं में ही बड़े खूबसूरत लगते हैं ,भले ही वे मैदानी  शहरो की तुलना में छोटे होते है ।एक बात और ,मंसूरी ,नैनीताल या शिमला आदि शहरों की अपेक्षा ,दुर्गम रास्ते होने के कारण ,पर्यटकों से मुक्त ये ,एक अलग ही सौंदर्य, प्रस्तुत करते हैं। इस कारण ये शहर ,कोलाहल से दूर ,एक अनोखे शांति से सराबोर ,हृदय को बहुत ही अच्छे प्रतीत होते हैं ।हम भी इसी शांति के सुख में डूब रहे थे ।हमने गौर किया कि जितने भी शहरों में हम अभी इस यात्रा के दौरान गुजारें है ,वे सभी ,पर्यटकों की पहुंच से दूर हैं ।इसका एक मुख्य कारण तो इनकी देहरादून से चारधाम जाने वाले मुख्य  मार्ग पर नही होना है , जिस कारण, मौसम के हर दौर में पर्यटक और उनके प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों से  इन शहरों का  रिक्त होना है।इस समय शायद हम अकेले ही इस शहर के एक मात्र पर्यटक थे ।

      उत्सुकतावश ,हमने ,एक लोकल निवासी से जब इस नदी का नाम पूछा तो हमारा एक सुखद आश्चर्य से सामना तो हुआ ही ,साथ ही अपने भाग्य को भी सराहा !! “” सरयू “” है इस नदी का नाम !! हम आश्चर्य और श्रृद्धा से भर उठे ।ऐसा सुखद संयोग की तो हमने कल्पना ही नही की थी ।चौड़ी लेकिन पतली सी ये जलधारा ” अयोध्या ” के पवित्र शहर की विशाल जलराशि वाली सरयू नदी ही है ,हम चमत्कृत रह गए ।सारी थकान भूल ,हम सब दोनो हाथ नदी की ओर जोड़ ,आंख मूंद ,काफी देर तक खड़े रहे ।”” अरे साहब आपकी चाय तैयार है “” ,ये सुन कर ही हम जैसे तंद्रा से जागे ।शायद ही कभी चाय में इतना स्वाद आया होगा ,जितना इस समय आया था ।घड़ी देखी ,अभी तो साढ़े चार ही बजे थे,दिन छुपने में अभी दो घंटे का समय था ,तो निर्णय हुआ कि आगे बढ़ेंगे ।आगे हमारी मंजिल थी “” अछूते ,बर्फ से ढकी चोटियों की सीधे गोद में ,परंतु आठ हजार फुट की ऊंचाई वाले प्रसिद्ध शहर “” मुंसियारी “” । मुंसियारी एक दूरस्थ, पर्वतीय शहर है जो हिमालय पर्वत श्रेणी में ,उत्तराखंड का अंतिम बड़ा शहर है।ये वर्ष में दस महीने बर्फ से ढका रहता है ।ये मैदानी इलाकों से इतना दूर है कि सामान्य यात्री यहां आने की हिम्मत ही नहीं करते ।वो तो हम जैसे कुछ ही रोमांच वाले पर्यटक हैं जिन्होंने यहां आने की ठानी हुई थी ।

      गुगल मैप के अनुसार यहां से मुंसियरी शहर की दूरी एक सौ बीस किलोमीटर से भी अधिक थी , वहां तक पहुंचने के दो रास्ते थे ।एक तो “” कपकोट “” होते हुए जो कि घने वनों एवम बहुत ही ऊंचे ,नीचे पर्वतीय मार्ग पर था ,दूसरा था “” चकोरी “” होते हुए ,जो कि अपेक्षाकृत कम ऊंचाई एवम आबादी क्षेत्र से होकर गुजरता था । ये तो स्पष्ट था कि हम शाम तक तो इतनी दूर वहां नही  जा सकते थे ।चूंकि हमारी आगामी मंजिल काफी दूर थी ,इस लिए निर्णय लिया की जब तक अंधेरा नही होता ,तब तक हम चलते रहेंगे ,अंधेरा घिरने पर मार्ग में जो भी आश्रय स्थल मिलेगा वहीं रात्रि विश्राम करेंगे ।बस ,फिर क्या था ,  “”जय श्री राम “” के नारे के साथ हमने अपनी कार आगे बढ़ा दी ।

       (  क्रमश …….. शेष अगले भाग पांच में )

3 responses to “यात्रा ……. उत्तरा खंड :: घनसाली शहर”

  1. कई पर्वतीय स्थानों पर घूमें हैं आप। भ्रमण का सुंदर विवरण लिखा है आपने।

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  2. बहुत सुंदर वर्णन. यहाँ जाने के इच्छुक मित्रों के लिए थोड़ा और स्पष्ट रूप से गाइड करें. प्रस्थान बिंदु का उल्लेख होना महत्वपूर्ण है😄

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    1. अगर कभी जाने का प्रोग्राम बनाएं तो मिल ली जी एगा।
      उत्तरा खंड यात्रा ई और भाग पहले पढ़ लीजिए ,आनंद लीजिए ।

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