यात्रा ……..उत्तराखंड : : चंबा ,टिहरी डैम

     

 

इस से पहले कि हम मंसूरी से हिमालय अर्थात उत्तराखंड की यात्रा पर आगे चलें ,इस से पूर्व आप जरा उत्तराखंड का नक्शे पर गौर फरमाएं।हमने उत्तराखंड की यात्रा इसके पश्चिमी किनारे यानी देहरादून से आरंभ की है और सीधे उत्तराखंड के पूर्वी अंतिम छोर पिथौरागढ़ से पुनः वापसी की योजना बनाई है ,साथ ही हमने इस बात पर भी फोकस किया है कि ये यात्रा हम मुख्य मार्गों से नही करके ,उत्तराखंड के अत्यंत दुर्गम ,घने वनों से आच्छादित वन मार्गों से जो कि अधिकांश गैर उत्तराखंडी के लिए एक दम अनजान हैं से करेंगे।अगर आप भी हमारे साथ इन अनजाने मार्गों से उत्तराखंड की यात्रा के लिए तैयार हैं तो विश्वास कीजिए आप भी रोमांचित हो उठेंगे। तो चलिए यात्रा का  आरंभ मंसूरी से करते हैं।

         

 मंसूरी की बसावट आप देखेंगे तो ये दो मुख्य बाजारों में ही बटी है।

एक है आधुनिक सुख सुविधाओं से भरपूर माल रोड ,जो कि केवल और केवल ट्यूरिस्टों के ही आकर्षण का मुख्य केंद्र है और दूसरा है स्थानीय निवासियों का मूल परंतु पुराना शहर का बाजार जिसे “” लंधौर “”बाजार के नाम से पुकारा जाता है।

अब मंसूरी से आगे की यात्रा के लिए छोटा मार्ग इसी एक किलोमीटर लंबे बाजार से गुजरता है अन्यथा बाई पास लेना होता है जिसकी दूरी दस किलोमीटर के लगभग है।इस लिए इसी लंधौर के बाजार से आगे बढ़ने का विचार कर के यात्रा आरंभ की !अब जैसे ही इस बाजार में हमारी कार ने प्रवेश किया तो हम सब हैरान रह गए ,इतना छोटा बाजार कि हमारी कार के एक तरफ छोटी छोटी दुकानें ,तो दूसरी तरफ सीधे खड़े पहाड़ ,अर्थात अगर सामने से कोई दूसरा  वाहन वहां आ जाए तो फिर भगवान ही मालिक ! वो तो ऊपर वाले का धन्यवाद कि हमे ये एक किलोमीटर लंबे ,बहुत ही संकरे मार्ग में कोई रुकावट नहीं मिली ,हम धीरे धीरे गाड़ी आगे बढ़ाते रहे और जैसे ही ये बाजार समाप्त हुआ कि हमारी सांस फिर रुक सी गई ।क्यों वो ऐसे कि इस बाजार के अंत में एक सीधी लगभग पचास या साठ डिग्री की चढ़ाई और इस पर संकट ये कि आगे एक दम अंधा मोड़ ।एक बार तो लगा कि भले ही हमारी कर नई है परंतु क्या इतनी सीधी चढ़ाई पर बिना रुके चढ़ पाएगी , और सामने से इस चढ़ाई पर अगर कोई दूसरा वाहन आ गया तो फिर तो … ! कुछ क्षण विचार विमर्श के बाद निश्चय कर लिया कि यात्रा की ये एक परीक्षा है जिसका परिणाम हमारी आगामी कार यात्रा को तय करेगा ।अगर हम ये दुर्गम परंतु शहरी ,एक दम सीधी चढ़ाई चढ़ गए तो यकीनन आगे की यात्रा सफल अन्यथा ….. ,और हमने जोर से हॉर्न बजाते ,भगवान का नाम लेते कार इस मार्ग पर चढ़ा दी !विश्वास कीजिए ,जब ,पचास डिग्री की सीधी चढ़ाई चढ़ कर जैसे ही दो सौ मीटर की दूरी पर हमारी कार समतल सड़क पर पहुंची तो कार में बैठे चारों की लंबी सांस खींचने की आवाज गूंज सी उठी।निसंदेह ,अब हमारी टेंशन समाप्त हो चुकी थी !

      कुछ ही पल में हम समतल परंतु टेढ़ी मेढी सड़क पर अपनी आगे की यात्रा पर बढ़ चले।थोड़ी ही देर में सड़क के दोनो ओर की दृश्यावली बदल गई। एक ओर गहरी खाई ,जिसके नीचे की ओर थोड़ी थोड़ी दूर पर बने छोटे छोटे घरों के समूह , सीढ़ी दार,ढलानों पर बने खेत एक अलग ही दुनिया के दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे तो दूसरी ओर सीधी खड़ी चट्टानों का रूप ,सड़क ऐसी कि स्टीयरिंग पर हाथ लगातार दांए ,बाएं घूम रहे थे।हमारे विचारों में यही इस वक्त आया था कि  हमने इतनी बार कार के स्टीयरिंग पर  हाथ लहराए  थे कि कुछ ही किलोमीटर की यात्रा पर जैसे हमने महीने भर की हाथों की कसरत पूरी करली थी।

       

  हमारी आगामी मंजिल मंसूरी का एक प्रसिद्ध स्थल “” धनौल्टी “” था जो कि केवल पैंतीस किलोमीटर की दूरी पर था ,परंतु इस यात्रा में भी दो घंटे से अधिक समय लगने वाला था।उत्तराखंड की एक विशेष बात ने हम सब का ध्यान खींचा था कि सड़कें एक दम ठीक हालत में बनी हुई थी।उत्तर प्रदेश की तरह यहां गढ़ों का कोई चिन्ह तक नही था ,ट्रेफिक भी नही के समान था ,परंतु मार्ग इतना टेढ़ा मेढा था की कार की गति  तीस किलो मीटर से अधिक हो ही नही सकती थी ,अगर इस से अधिक गति बढ़ाते तो शायद ये ब्लॉग लिखने की संभावना ही न

 होती !!

     

अभी धनोल्टी लगभग सात किलोमीटर दूरी पर था , कि सूरज देव ने आज की अपनी यात्रा समाप्त होने का जैसे संकेत दे दिया था ,उनकी तेज चमक अब सुनहरी लालिमा में ढलने लगी थी।तभी हमने देखा की धनौल्टी की ओर से कारों के काफिले  के काफिले आने लगे , और गौर किया कि प्रत्येक कार के बोनट पर बर्फ से बने “” स्नो मैन “” बने हुए थे ।

किसी किसी कार वाले ने इस बर्फ के पुतले के सिर पर केप तो किसी ने उसकी आंखो पर काला चश्मा तो किसी ने गर्दन पर स्कार्फ लिपटाया हुआ था। ऐसे ही कारों के बोनट के ऊपर तमाम तरह से सजे बर्फ से बने पुतलों को देखते हुए समझ आ गया कि धनोल्टी में चार दिन पहले जो हिमपात हुआ था उसके अवशेष अभी भी वहां होंगे।हम रोमांचित हो उठे। हमारे लिए , हमारी यात्रा के लिए  ये एक शुभ संकेत प्रतीत हुआ ।मन तो कर रहा था की कार की गति तेज कर दूं ,ताकि अंधेरा होने से पहले ही बर्फ में डूबी धनोल्टी जा पहुंचे ,परंतु सड़क के किनारे जैसे हमे चेतावनी भी दे रहे थे कि “” speed thril ,but kill “” अर्थात तेज चले तो सीधे मौत के मुंह में !?

       

 तभी हमारी रही सही गति पर और विश्राम लग गया ,जब सड़क पड़ी बर्फ एक पानीदार कीचड़ में बदल गई।तेज चलने का तो अब कोई प्रश्न ही नहीं था ।मार्ग के दोनो ओर थोड़ी थोड़ी दूरी पर बर्फ बिछी हुई थी ,परंतु ढलती शाम हमे  नही रुकने का स्पष्ट संदेश दे रही थी ।

     यात्रा के आरंभ में हमने निश्चय कर लिया था कि इस यात्रा में जब भी अंधेरा हो जायेगा ,हम अपनी यात्रा का वहीं विश्राम कर लेंगे चाहे वो स्थान गांव हो , कस्बा हो अथवा शहर हो ! अब ये बात भी स्मरण में थी कि उत्तरा खंड में बड़े शहर गिने चुने ही हैं , हां कस्बों की संख्या बहुत अधिक है। इस लिए चारों तरफ बर्फ देखते हुए ,आगे बढ़ने के सिवाय और कोई चारा नहीं था।

      थोड़ी हो देर में जब हम धनौल्टी पहुंचे तो ढलती शाम में वो एक भुतहा गांव नजर आया। एक आध रेस्टोरेंट ,एक दो होटल खुले होने ,जिनमे कोई यात्री दिखाई नही देने से ,मन व्यथित होने लगा।शीघ्र ही समझ आया कि अभी पर्यटक सीजन नही होने के कारण ,बर्फ गिरने के कारण केवल गिने चुने पर्यटक जो मंसूरी से  आए हुए थे ,वापस मंसूरी जा चुके है।तुरंत सर्व सम्मति से ,जी  हां ,हमने यात्रा के आरंभ में निर्णय लिया था कि इस यात्रा में जहां भी रुकना होगा ,जिधर भी भोजन करना होगा ,एक राय हो कर मानेंगे , हां एक बात और तय की थी कि मतभेद होने पर मेरी राय अंतिम वीटो के रूप में मानी जाएगी ,आखिरकार इस यात्रा की रूप रेखा मैने जो बनाई थी।अब चूंकि शाम की रोशनी अभी काफी बाकी थी तो हमने आगे बढ़ने का विचार कर लिया।घड़ी देखी तो शाम के पांच ही बजे थे ,हमारे मैदानी स्वभाव के अनुसार तो अभी अंधेरा होने में काफी देरी थी ,इस लिए अपनी कार आगे बढ़ा दी।

       

 लगभग एक घंटे पश्चात हम “” चंबा “” नामके कस्ब में प्रवेश कर गए।चंबा नाम से भ्रमित मत होइए ,ये हिमाचल का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल चंबा नही ,अपितु गढ़वाल जिले का एक व्यस्त राजमार्ग के दो मार्ग के संगम पर बसा एक छोटा सा कस्बा ही था।

इस कस्बे से हरिद्वार बद्रीनाथ राज मार्ग गुजारता है जिसमे से एक मार्ग गंगा नदी के ऊपर बने विशाल  टिहरी डेम की ओर जाता है जिसके किनारे कभी पुराना टिहरी शहर बसा था जो इस डेम के बनने के बाद ,उसकी विशाल ,नीली गहरे जल के अंदर जल समाधि ले चुका है,अब  इस पुराने शहर के स्थान पर कुछ दूरी पर , एक विशाल पर्वत के ऊपर विस्थापित शहरियों के लिए नया टिहरी शहर बसा दिया गाया है।चूंकि इस यात्रा में शहरों में घूमने की हमारी कोई रुचि नहीं थी ,हम अभी असमंजस में खड़े ही थे कि एक अनजान स्थानीय ने हमारी दशा भांप ली और हमारे समीप आकर मदद की पेशकश की।जब हमने अपनी दुविधा बताई तो उसने एक महत्व पूर्ण सलाह दी “” अगर आप वास्तविक उत्तरा खंड की यात्रा का आनंद लेना चाहते हैं तो आप नए टिहरी की ओर नही जा कर इस पुराने टिहरी शहर के उपर बने डेम से होते हुए प्रकृति की गोद में बसे “” घनस्याली शहर की तरफ जाए  ,मार्ग में आप टिहरी डेम की विशालता ,भव्यता का आनंद भी लें ,क्योंकि घनस्यालि शहर के लिए आपको ये डेम भी पार करना होगा,  जरा जल्दी कीजिए,क्योंकि ये टिहरी डेम शाम के ठीक साढ़े छह बजे यात्रा के लिए बंद कर दिया जाता है।हमने उसे इस महत्व पूर्ण सलाह के लिए धन्यवाद दिया और हम मुख्य राज मार्ग को छोड़ कर बाईं ओर ,टिहरी डेम की ओर चल पड़े जो कि वहां से अठारह की. मि. ही था ।

     जब हम इस अस्तव्यस्त से चंबा कस्बे से बाहर निकले तो इतनी दूरी से भी शांत बहती गंगा नदी की खुशबू जैसे हमे रोमांचित करने लगी ! सड़क एक दम खाली थी ।एक आध वाहन ही डेम की ओर से आते नजर आए ,बाकी तो शायद डेम की ओर जाने वाली हमारी एक मात्र कार थी। सड़क सीधे तीव्र ढलान लेती हुई हमें जैसे डेम की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित सी कर रही थी।लगभग छह बजे के करीब हम टिहरी डेम पहुंच गए।

डेम से लगभग एक की. मि.पूर्व से ही मार्ग के दोनो ओर डेम के निर्माण से संबंधित ऑफिसों ,गोदामों  तथा बेतरतीब पड़ी निर्माण सामग्रियों से पूरा इलाका जैसे आटा पड़ा था। कमाल था कि न कोई रेस्टोरेंट ,ना ही कोई होटल दिखाई दे रहा था।चूंकि ये डेम दो विशाल पर्वत चोटियां की गहराइयों में ,एक संकरे स्थान पर बनाया गया था जिसके एक ओर जिधर तक देखें ,विशाल ,अथाह जल राशि जैसे किसी विशाल झील के आकार में ढली हुई थी। डेम के दूसरी तरफ विशाल,ऊबड़ खाबड़ गहराइयों में पर्वतों की चोटिया के मध्य , एक पतली सी जलधारा के रूप में विशाल गंगा , जैसे अपना मुंह छिपाए हुए सी दुबक सी गई थी। हम इस सम्मोहक नजारे मे जैसे खोए हुए थे कि तभी कुछ शस्त्र धारी जवानों ने हमें टोका “” आप लोग कहां से आए हैं ,यहां क्यों खड़े है ,किधर जा रहे है ,,अपना परिचय पत्र दिखाइए “” तो जैसे हम होश से में आए।देखा ऊंची ऊंची पर्वतों की इन विशाल गहराइयों में शाम की मध्यम रोशनी कब की गुम हो चुकी थी ,उसके स्थान पर अंधेरा अपने साम्राज्य की जैसे स्थापना सा कर रहा था “” जी हम यात्री है तथा घनस्याली की ओर जा रहें है “” ,”” तो यहां क्यों खड़े है,यहां सुरक्षा कारणों से रुकना मना है।”” हमारे परिचय पत्र देखने के बाद उसने कहा कि इस डेम को पार करने के लिए केवल दस मिनट बचे हैं,तुरंत आगे बढ़िए , अन्यथा डेम का गेट बंद हो जाएगा।तभी हम सब को यात्रा के आरंभ में किए गए निर्णय का स्मरण हो आया कि हम इस यात्रा में अंधेरे में यात्रा नही करेंगे तथा जो भी स्थान होगा वहीं यात्रा का विश्राम करेंगे।साथ ही सोचा कि यही डेम के किसी होटल में रात काट कर सुबह अच्छी प्रकार से डेम का मनोरम दर्शन करेंगे ,परन्तु जैसे ही उसने कहा कि यहां कोई होटल आदि नही है ,या तो आप वापस चंबा जाइए या आगे डेम पार करके बढिए! हमारा निर्णय स्पष्ट था कि हमे तो आगे ही बढ़ना है ,इस लिए धीरे धीरे अपनी कार डेम की बढ़ाते ,उसकी विशालता को मध्यम रोशनी में देखते आगे बढ़ने लगे। हमारी हैरानी की सीमा नहीं रही जब हमने देखा कि डेम की सड़क शुरु होने की जगह पर पूरी मुस्तैदी के साथ सुरक्षा बलों की एक पूरी टोली खड़ी थी !! 

      हमें  शंका भरी नजरों से देखते हुए वे आगे बढ़ने का लगातार इशारा करते रहे। हम इस विशाल डेम के ऊपर चलते हुए ,सी सी टीवी की नजरों में आते हुए , कार रोक कर ,डेम के ऊपर से विशाल जल राशि को देखने की अभिलाषा को दबाए ,केवल अपनी आंखो से ,इसका सौंदर्य पान करते हुए आगे बढ़ते रहे,क्योंकि कैमरे से फोटो लेने की मनाही थी।   लगभग दस मिनट की इस डेम की यात्रा शायद हमारी स्मृतियों में बरसों तक बसी हुई रहेगी। अब जैसे ही हमने डेम को पार किया ,तब तक अंधेरे ने हमे पूरी तरह घेर लिया था।डेम के इस पार एक दम निर्जन स्थान ,एक शून्यता का अहसास ,अब किसी रात्रि विश्राम के लिए आगे बढ़ने के सिवाय कोई चारा नहीं होने के कारण अंधेरे में ,छोटी सी सड़क पर , कार की दोनो लाइटों की रोशनी के सहारे , टेढ़े मेढे परंतु लगातार ऊपर चढ़ते चले जाने को विवश हो गए।अब अंधेरे में पर्वतीय स्थलों के सौंदर्य से विहीन हम आगे बढ़ते ही रहे।

     

लगभग दस की. मि. की दूरी तय करने के पश्चात अचानक सड़क के एक ओर मील का पत्थर नजर आया। कार की रोशनी में जब पढ़ा तो जैसे कलेजा मुंह को आ गया “” श्रीनगर 120 तथा घनस्याली 95 की. मि “”!

       वैसे भी हम सुबह नौ बजे से निकले हुए थे तो तीस ,पैंतीस की स्पीड से अधिक नही चल पाने के कारण तो हम सात घंटो से पहले इनमे से किसी भी स्थान पर नही पहुंच पाएंगे तो फिर निर्णय हुआ कि मार्ग में शायद किसी कस्बे में जो भी होटल मिलेगा ,उसी में रात्रि विश्राम करेंगे ,आगे बढ़ते रहे ।अभी हम पंद्रह की. मि. ही चले थे कि दूर अंधेरे में टिमटिमाती कुछ रोशनियां दिखाई दी।तस्साली हुई कि अवश्य ये कोई कस्बा या गांव है ,तो यहां रात्रि विश्राम का कोई साधन होगा।अब ये समझिए कि पर्वतीय मार्ग की रात्रि की एक विशेषता होती है कि अंधेरों में चमकती रोशनियां प्रतीत होती है कि वे हमारे समीप है ,परंतु बलखाती सड़कों पर जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं वैसे वैसे वे रोशनियां भी आगे बढ़ती रहती हैं।तभी हमे पुस्तकों में पढ़ी, विशाल रेगिस्तानों में ,”” मृग मरीचिका “” की जलराशि का जो विवरण पढ़ा था शायद इस समय वही मृग मरीचिका हमे जल की जगह रोशनी की टिमटिमाती दिखाई दे रही थी।आगे बढ़ने के सिवाय कोई चारा नहीं होने से हम आगे बढ़ते  रहे ।अचानक जैसे ही हमने एक मोड़ पार किया तो तुरंत किसी रोशनियों से दमकते गांव के किनारे आ पहुंचे थे।शाम के सात बजे थे ।केवल एक ही दुकान खुली थी जिसके आस पास कुछ घर बने हुए थे।हमने तुरंत उस दुकानदार से रात्रि विश्राम के लिए कोई स्थान होने की जानकारी ली तो हम थकान एवम निराशा के भंवर में डूब से गए।** इस गांव में कोई होटल नही है आगे पंद्रह की. मि . की दूरी पर एक होटल है , वहां ही रुकने की जगह होगी ** ।निराशा से पुनः आगे बढ़ गए।अब तो मार्ग में कोई रोशनी के संकेत भी नजर नहीं आ रहे थे ।धीमी रफ्तार ,घुप अंधेरा ,टेढ़ी मेढी सड़क ,जन शून्य अनजान मार्ग पर आप समझ सकते हैं कि ये पंद्रह किलोमीटर की यात्रा हमे जैसे ढेड़ सो की लगने लगी थी।अब मैदानी इलाका होता तो शायद इसे पार करने में दस मिनट भी नहीं लगते परंतु प्रतीत होने लगा था कि या तो इस व्यक्ति ने हमे झूठी दिलासा दे कर आगे बढ़ा दिया था या शायद पहाड़ी मार्गों के किलोमीटर की दूरी शहरी किलोमीटर से शायद बहुत अधिक ही होगी! विश्वास कीजिए लगातार चलते हमे डेढ़ घंटा हो चुका था रोशनी का ,जिस से हम अनुमान लगा पाएं कि वहां हमे रात्रि विश्राम हेतु कोई होटल मिलाएगा ,कोई संकेत तक नही था । हमारे पास लगातार चलने के अलावा कोई चारा ही नही था। तभी अचानक हमने जैसे ही एक मोड़ पार किया ,अंधेरी में पूरी खुली आखें चुंधीयती सी हो गई ।सामने ,एकदम सामने रोशनी में जगमगाता बोर्ड चमक रहा था “” गंगा लाज “”!

    तुरंत कार रोकी , चैन की सांस लेते उस लाज जो शायद किसी बड़े लेकिन ग्रामीण परिवेश में ढली एक बड़े से किराना स्टोर ,एक छोटे से ढाबे नुमा ,में ढली हुई थी ,उसके अंदर घुसे। “” हमे रात्रि बिताने के लिए दो कमरे चाहिए “” लेकिन जवाब में जो सुना उस से हमारे होश उड़ गए ।केवल एक ही रूम खाली है ,देख लीजिए। किंकर्तव्य विमूध से हम चारों एक दूसरे का मुंह ताकने लगे ।हम तो सोच रहे थे कि इस अत्यंत दुर्गम ,केवल दो दुकानों वाले स्थान पर,इस लाज में शायद ही कोई रुकेगा ,तभी उसने कहा “” रूम देख लो ,पलंग बड़े है आप चारो इस पर सो सकते हैं””!”” तो कुछ आगे क्या कोई और जगह पर होटल मिलेगा “”,”” नही आगे तो अस्सी की . मि दूर घनस्याली में ही होटल मिलेंगे “”। और इस समय हम सब प्रातः के चले एक कदम भी चलने असमर्थ थे। कार में लगातार दस घंटो से बैठे बैठे कमर ,पीठ दोनो ही अकड़ गई थी।”” चलो दिखाओ भाई कमरे को “” ।सब इतने थके थे की वही बरामदे में रखी कुर्सियों पर ढेर से हो गए थे।भारी कदमों को एक तरह से खींचते खींचते में उस कर्मचारी के साथ आगे बढ़ा। कुछ कदम के बाद वो नीचे को जाती सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।मेने सोचा था कि बरामदे के बाद ही कमरे होंगे ,परंतु ये क्या ? मैं उसके पीछे नीचे उतरने लगा ,एक ,फिर दो ,फिर तीन और फिर मेरे धैर्य की सीमा खत्म हो गई ,”” अरे और कितनी मंजिल नीचे उतारोगे , हर मंजिल पर आठ कमरे ,चार मंजिल , और तुम कह रहे हो केवल एक ही कमरा खाली है”,उसने साधारण से स्वर में कहा ,”” हां एक ही कमरा खाली है “”!!

       जीरो वाट के हांफते से रोशनी दे रहे बल्बों के मरे से प्रकाश में ,नीचे की चौथी मंजिल के आठ कमरों में से जैसे ही एक कमरे का दरवाजा खोला , लाइट जलाई तो देखा ,सामने एक बड़ा सा डबल बेड ,पुरानी सी ,पतली सी बड़ी रजाई ,सामने दो पतले से तकिए ,पुरानी सी प्रिंटेड चद्दर दिखाई दी।अभी मै कुछ बोलता कि अचानक तेज सीलन की गंध मेरे नथुनों में भर गई।”” भैया कोई अच्छा सा कमरा दिखा दो ,इतने सारे तो कमरे है तुम्हारे होटल में “” , मैं स्वयं इस बदतर स्थिति में ,परिस्थितियों से जूझता ,भरसक अपने स्वर को पूरी शक्ति के साथ नम्र करते हुए ,रुआंसे से स्वर में बोला। “” हां ,कमरे तो बहुत हैं परंतु सब इस लिए फुल हैं कि सामने गंगा पार ,गांव में वार्षिक उत्सव का आयोजन हो रहा है ,लेकिन रात के समय एवम वहां तक पहुंचने का इस समय कोई साधन नहीं होने के कारण लोगवाग ,इन कमरों में रुके हुए हैं “”! “” लेकिन ये अचानक इतने सारे लोग कहां से आ गए ,जी ये इसी गांव के निवासी है ,लेकिन सब के सब दूर दिल्ली ,कानपुर ,पंजाब से इसी के लिए आए हैं  ,रात होने से यहीं रुक गए है । 

         विवशता वश ,मेरे पास अन्य कोई विकल्प नहीं होने ,साथ ही इतनी हिम्मत ही नहीं कि अपने साथियों के पास ऊपर जा कर ,उन्हें सारी बात समझा कर नीचे ले कर आऊं!!”” ठीक है ,ऊपर मेरे साथियों को नीचे भेज दो”” , मैं निढाल हो कर थकान से चूर पलंग पर जैसे ढह ही गया,साथ ही मन ही मन मैं अपने साथियों की प्रतिक्रिया को सुनने के लिए जैसे तैयार सा हो गया।

    कुछ देर बाद मुझे अपने सहयात्रियों की आवाज सुनाई दी “” अरे भाई ,हमने होटल मालिक से बहुत रिक्वेस्ट की तो उसने सामने बने एक अन्य कमरे को देने के लिए हां कर दी है !मगर कैसे ,वो ऐसे ही कमरे की स्थिति तो हमने ऊपर एक यात्री के खुले कमरे को देख कर ही कर ली थी ,अब कोई अन्य उपाय नहीं होने के कारण होटल मालिक को जरा मस्का लगाया ,कुछ ढेड़ गुने किराया का लालच दिया और रात बिताने को कमरा मिल गया !!

         बस अब संक्षिप्त में इतना ही कि कमरे की सीलन को दूर करने के एक अगरबत्ती जलवाई ,जब तक जागे रहे ,रजाई को अपने मुंह से दूर रखा ,नींद आने तक इस विचार को बलपूर्वक दूर रखा कि यात्रा की पहली रात में ये हाल हुआ है तो आगे भगवान जाने ,फिर जो आंख मूंदी तो अगली सुबह एक दम शांत वातावरण में पक्षियों  की बहुत ही दिनों पश्चात चहचहाट की मधुर ध्वनियों से ही खुली !!

                                 

 

 ( शेष : क्रमश भाग 4 में )

One response to “यात्रा ……..उत्तराखंड : : चंबा ,टिहरी डैम”

  1. बहुत सुंदर और सुरुचिपूर्ण यात्रा का विवरण। ऐसे लगता है जैसे हम खुद चल रहे हो

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