यात्रा ……उत्तराखंड :: देहरादून ,मसूरी का आनंद

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            ** खाली खाली झोलों से ,खाली भोर दोपहरी से , हम तो झोला उठा के चले ,ओ ओ रामचन्द्र रे **  मन ही मन गुनगुनाते हुए,  जैसे ही हम चारों हिमालय की अपनी दुरूह यात्रा पर निकले तो अनायास ही उपरोक्त गीत हमारी जिव्हा पर जैसे थिरकने लगा। दुरूह इस लिए लिख रहा हूं कि कहानियों एवम वास्तविकता बहुत अंतर होता है। 

 लोक बंदी के पूरे एक वर्ष बाद जैसे हम सब एक उन्मुक्त ,आजाद पंछी की तरह उड़ने लगे थे ,”” हिमालय “” की ओर ! अपनी यात्रा के प्रारंभिक स्थान ** देहरादून ** के बारे में आपको कुछ जानकारी दूं तो ये अनुचित नही होगा।

आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व का देहरादून ,जिसे उस समय ** Heaven of the pensionars ** अर्थात रिटायरमेंट के पश्चात के समय को बिताने के लिए भारत के कुछ सर्वोत्तम शहरों में से एक माना जाता था,आज जैसे ही हम भाई के निवास स्थान से कुछ ही दूर चले थे कि **उत्तराखंड की राजधानी ** बनते ही प्राचीन देहरादून तो जाने कहां खो गया था ,उसके बदले में था “” बड़े बड़े महानगरों की तरह वाहनों के जाम से कराहता शहर,बड़ी बड़ी सड़कें परंतु घने वृक्षों के स्थान पर नए नए विशाल शो रूम ,लोगों की भारी रेलमपेल ,मन भर आया। मैने पूर्व में देहरादून को भली भांति देखा था ।उस समय इस शहर का केंद्रीय स्थान होता था अंग्रेजों द्वारा स्थापित लाल सफेद रंग से बना घंटाघर  ,जिसके चारों ओर ,अधिक से अधिक पांच किलोमीटर तक ही ये शहर बसा था।इसी घंटाघर से एक मार्ग पहाड़ों की रानी कहे जाने वाली मंसूरी की ओर ,तो दूसरा आई एम ए ,अर्थात इंडियन मिलिट्री एकेडमी जो की पूरी दुनिया में अभी भी मिलिट्री ट्रेनिंग के लिए सर्वोत्तम एकेडमी मानी जाती है ,तथा एक अन्य मार्ग देहरादून शहर को देश की राजधानी दिल्ली से जोड़ते हुए जाता था।इसी घंटाघर के एक दम नजदीक से प्रारंभ एक मात्र बाजार होता था जिसे “” पलटन बाजार “” कहते थे ,क्योंकि अंग्रेजों के शासन के दौरान सेना की पलटने ,देहरादून के इस एकमात्र बाजार में खरीद दारी करने आती थी,एवम लगता था जैसे कि दिल्ली के चांदनी चोक के बाजार में खरीद दारी कर रहे हों!

     

जैसे कि मैने पहले लिखा है की इसी घंटाघर से ,जो आज भी शान से मगर हमारी ही तरह हैरान परेशान सा खड़ा है ,से जो मार्ग मंसूरी की ओर जाता है ,उसे राजपुर रोड कहते हैं जो कि इस जगह से सात किलो मीटर दूर ,एक छोटा सा कस्बा था जो की आज देहरादून का ही एक मोहल्ला बन कर रह गया है।इस सात किलो मीटर के दोनो ओर उस जमाने के धनाढ्य ,एवम अभिजात वर्ग के बीघों में बनी कोठिया होती थी ,जिनके चारों ओर कठहल ,लीची ,आम और संतरों के विशाल वृक्ष लहराते रहते थे। और तो और ,इस देहरादून के चारों ओर चाय के बड़े बड़े बागान ,अपने मध्य , दुनिया की सबसे बढ़िया चाय पत्ती के साथ बासमती चावल की महक से इस खूबसूरत शहर को स्वर्ग जैसा बनाते थे,वही इस समय इन सब की जगह कंकरित के विशाल  दरबे नुमा घर ,दुकानों बहुमंजिले भवनों तथा अनगिनत स्कूलों ,विश्व विद्यालयों में कहीं लुप्त हो गए हैं।मन खिन्न हो उठा!!

 

  देहरादून से अभी कुछ ही दूर निकले थे कि विशाल राजमार्ग एक संकुचित से इकाहरे सड़क मे बदल गया। और कुछ ही दूरी पर चलते ही जैसे हम घने जंगलों में गुम से हो गए।हर कुछ मीटर की दूरी पर चढ़ती सड़क ,टेढ़े मेढे मोड़ों पर ऐसे बल खा रही थी जैसे कि कोई नव विवाहिता प्रथम बार ससुराल जाए हुए इठलाते हुए चल रही हो ! हम शहरी परिवेश में रहने वालों के लिए ये एक अलग परन्तु विशेष हीअनुभव था।भले ही कार मै चला रहा था ,परन्तु मेरी आंखे सड़क के साथ साथ आसपास के प्रकर्तिक सौंदर्य का रसपान भी कर रही थीं।         

         

देहरादून से पीछा छुड़ाते हुए ,जब हरियाली ,ताजी पर्वतीय हवाओं ने हमारा स्पर्श किया तो लगा कि हां हम एक दुस्वप्न से जाग उठे हैं।

        अभी हम लगभग पंद्रह किलोमीटर ही चले थे कि सीधे हाथ की ओर एक मार्ग अलग हो रहा था ,जिसमे एक बोर्ड लगा था ** OAK GROVE SCHOOL JHARI PANI ** ।इस स्कूल से भी मेरी कुछ यादें जुड़ी हुई थी ,इस लिए हमने अपनी कार इस मार्ग पर मोड़ दी।

     

  इस यात्रा के पहले चरण में ,मंसूरी के पास स्थित अगर इस स्कूल के बारें में अगर आपको कुछ नही बताऊं तो ये उचित नहीं होगा क्यों कि ये स्कूल वर्ष 1933 जी हां 1933में गुलाम भारत में अंग्रेजों द्वारा पूर्व उत्तर रेलवे के कर्मचारियों जो कि निसंदेह अंग्रेज ही होते थे के बच्चों को इंग्लैंड की भांति शिक्षा देने के लिए ,तत्कालीन रेलवे विभाग द्वारा ही बनाया गया था।आज भी डेढ़ सौ वर्ष हो गए हैं तब भी ये स्कूल “” झारीपानी ” जगह में उसी शान बान से खड़ा है ,परंतु मंजर बदल गया है।

     

इस स्कूल के बारे में अगर लिखने बैठूंगा तो पूरे यात्रा वृत्तांत के साथ अन्याय होगा ,इस लिए इस लेख के साथ कुछ चित्र दिखा रहा हूं ताकि इस की विशालता ,उस समय के निर्माण का इतिहास ,जिस समय मंसूरी के लिए सड़क तक नही बनी थी ।केवल राजपुर तक सड़क बनी होने से सीधी खड़ी चढ़ाई पर पशुओं के द्वारा लाई गई निर्माण सामग्री से किस प्रकार इस स्कूल का निर्माण किया होगा ,ये सोच कर आज भी हैरानी होती है अपितु मेरा ये मानना ही कि इस स्कूल को तो “” हेरिटेज “” का विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए !!

     

  स्कूल को देखते हुए हैं उसी मार्ग से आगे बढ़े ** मंसूरी ** की और!

       

 इस पर्वतों की रानी मंसूरी में आकर थोड़ा मन एवम तन को शांति सी प्रतीत हुई।भले ही ये पहले की तरह एक छोटा सा पर्वतीय स्थल के स्थान पर एक बड़े ,आधुनिक शहर के  रूप में ,बड़े बड़े कई सितारों वाले होटलों के स्थानों में ढल चुका है ,फिर भी ठंडी शीतल हवा ,गिने चुने यात्रियों के कारण हृदय को सुकून सा प्राप्त हुआ।हांलांकि जिस हिमालय की यात्रा, उसके मनोहारी छटा के लिए हम आए थे उसका यहां नितांत अभाव ही था।इस लिए तीन घंटे बाद हमने शाम के ठीक तीन बजे ही इसे इसके हाल पर छोड़ आगे की यात्रा जो कि चंबा ,टिहरी ,धनोल्टी की ओर थी आरंभ कर दी।

                          ( शेष क्रम्हश भाग 3 में)

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