यात्रा ….. उत्तरा खंड : : यात्रा का आरंभ

       जीवन बिताने को उम्र कहते है और जीवन जीने को जिंदगी कहते हैं.

जिस प्रकार एक पंछी जो लंबे समय से पिंजरे में कैद हो , और अचानक एक सुबह उसे लगे कि अरे ! इस पिंजरे का दरवाजा तो खुला हुआ है ! तो….समझिए कुछ ऐसा ही मुझे प्रतीत हुआ जब कॉरोना की औषधि अर्थात को वैक्सीन की खोज होने की घोषणा हो गई ।मेरा घुमक्कड़ मन इस लोक बंदी के, पिंजरा रूपी कैद से आजाद होने पर नवीन यात्राओं के अनुभव लेने के लिए बैचेन हो उठा। “” तभी एक चिर परिचित आवाज ने जैसे स्वप्न से जबरदस्ती जगा दिया “” सुनिए जनाब , मै ये कुछ दिनों से देख रहीं हूं कि आप जो ये मोबाइल पर मैप पर इधर उधर देख रहे हो ना ,तो सुन लीजिए ,भले ही कोरोण का इंजेक्शन आ गया हो ,परन्तु ,जब तक ये इंजेक्शन आपको लग नहीं जाता ,तब तक आप,इस घर से बाहर नहीं जा सकते , और अगर जबरदस्ती जाने की जिद की तो मै बेटो को फोन लगा दूंगी हां “”! समझ में आ गया कि इधर कुआं , उधर खाई ,अब एक ओर पिंजरे से आजादी के लिए फड़फड़ाते पंछी की तरह खुले,नीले,विस्तृत आसमान मे उड़ने की व्यग्रता ,दूसरी ओर,पिंजरे के दरवाजे से ताला तो नदारद ,परन्तु दरवाजा बाहर से अभी भी बंद ! तीन चार रातें इसी दरवाजे को खोलने के उपाय खोजने में लगा दी कि तभी एक फोन कॉल ने जैसे दरवाजा खोलने का मार्ग दिखा दिया।फोन मेरी आदरणीय सासू मां का,भोपाल से था “” शैलेन्द्र बाबू , बंटी का जन्म दिन 8 फरवरी को है ,घर पर कथा का आयोजन किया है इस लिए आप दोनों एक सप्ताह के लिए भोपाल आजाओ ,अब ट्रेन भी आरंभ हो गई हैं ,साथ ही पूरे एक साल हो गया आप दोनों को भोपाल आए ।जी , हां अवश्य आएंगे ,”” कह कर फोन रख दिया।तुरंत पिंजरे का दरवाजा खोलने की युक्ति समझ आ गई। श्रीमती जी ,जो अभी तक घर से बाहर ना जाने के लिए चेतावनी दे रहीं थीं ,अब पशोपेश मे थी।मेरे दिमाग ने तो पहले ही इस समस्या का हल खोज रखा था।”” देखो ,तुम साले साहब के जन्म दिन पर अवश्य भोपाल जाओ,चूंकि वहां सात दिन रहना है तो इस सक्रमण काल मे ,मेरी जैसे उम्र वाले के लिए ,इतने दिन घर से बाहर रहना उचित नहीं होगा ,इस लिए तुम सात तारीख को भोपाल ट्रेन से चली जाओ , मै सात दिन बाद ,एक दिन के लिए तुम्हे लेने भोपाल भी आ जाऊंगा ,इस से नाराजगी और संक्रमण दोनो से बचाव हो जाएगा “” ।किंकर्तव्य विमूढ़ श्रीमती जी को मैने अधिक विचार विमर्श का अवसर नहीं दिया।अगले ही पल ,मोबाइल उठाया , और सात तारीख में मथुरा से , प्रातः सात बजे वाली शताब्दी ट्रेन से उनके भोपाल जाने की सीट भी रिजर्व करा दी !! पिंजरे का दरवाजा खुल चुका था। फ़रवरी का मौसम वैसे तो मैदानी इलाको में कोहरे ,ठंडी हवाओं का होता है ,परन्तु पर्वतीय क्षेत्रों मे फरवरी से लेकर जून माह तक मौसम तीव्र धूप का होता है, फरवरी एवम मार्च मे सारे पर्वतीय क्षेत्र , यात्रियों के रेलमपेल के विपरित एक दम शांत एवम सुकून से भरे रहते हैं।मेरे अनुभव के आधार पर, पर्वतीय क्षेत्रों में घूमने के लिए ये माह सब से अधिक सुविधा जनक होते हैं।

फिर क्या था ,मोबाइल खोला ,भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में उन स्थानों को चुन लिया , जहां मेरी बरसों से साध थी कि बिना किसी प्रायोजित कार्यक्रम के ,बस एक छोर से यात्रा आरंभ करनी है तो दूसरे छोर पर समाप्त करनी है। जहां मन करेगा वहीं रुकेंगे ,नहीं तो आगे बढ़ लेंगे ।”” अरे,एक बात तो बताना भूल गया , इन पर्वतीय क्षेत्रों में घूमने की इच्छा इस लिए और बढ़ गई थी , कि दो माह पहले ही ,अपनी पुरानी खटारा कार के बदले ,नई ,पूरी तरह स्वचालित अर्थात ऑटोमेटिक कार खरीद ली थी।

बस अब तो मन इस नई कार के साथ नई नई जगहों पर जाने के लिए ,साथ ही श्रीमती जी के भोपाल जाने के कारण ,कोई रुकावट नहीं होने के कारण ,व्यग्र होने लगा था।तो चलिए ,जब संक्रमण से ले कर,पारिवारिक व्यवधान हट गए हैं तो आप भी मेरे साथ चलिए उत्तराखंड के “” गढ़वाल से ले कर कुमाऊं अंचल”” तक की **शाब्दिक यात्रा** पर !! सात फरवरी को ,ठीक सात बजे ,मथुरा स्टेशन से जैसे ही शताब्दी ट्रेन ,श्रीमती जी को लेकर पश्चिम दिशा की ओर बढ़ी ,वही , मै ठीक आठ बजे अपनी नई कार को ले कर उत्तर दिशा की ओर बढ़ गया, सर्व प्रथम “” उत्तराखंड “” की राजधानी “” देहरादून “” की ओर !

मेरी योजना थी कि मै अपनी यात्रा ,देहरादून से आरंभ करके ,मंसूरी ,चंबा ,टिहरी डेम, घांस्याली ,पोड़ी , ग्वालदम, लैंसडाउन,घिर्सू ,मुनिस्यारी ,गोपेश्वर ,पिथौरागढ़,एवम कुमाऊं अंचल के नेनििि ,कोसानी ,अल्मोड़ा , नेेेेेनिताल रानीखेत सहित , नील वर्ण के साए में चमकते ,दमकते शुभ्र ,सफेद रंगों से आच्छादित हिम चोटियों के नजारों को ,अपने नयनों के द्वारा हमेशा हमेशा अपनी स्मृति में बसाता हुआ ,हरिद्वार में ,सौभाग्य से ,कुंभ के अवसर पर मिले गंगा स्नान के साथ ,यात्रा का अंत करूं। लगभग दो घंटों की यात्रा के पश्चात ,इस यात्रा में मेरे साथ चलने वाले मेरे मित्र श्री जे पी शर्मा ,चचेरे भाई श्री महेंद्र कुमार शर्मा , को नोएडा से लिया । मेरे छोटे भ्राता श्री नरेंद्र को देहरादून से ,उनके निवास स्थान से ही लेने का प्रोग्राम ,पूर्व से ही निर्धारित था। खैर ,लगभग आठ घंटों की देहरादून तक की थका देने वाली यात्रा के बाद जैसे ही देहरादून शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों से भी बीस किलोमीटर दूर , भाऊ वाला क्षेत्र में भ्राता के निवास स्थान पर पहुंचे तो ढलती शाम के साए में ,थकान जैसे एक दम लुप्त हो गई।

उनका घर मंसूरी पर्वतीय स्थल के एक दम नीचे अवस्थित था जो कि चारों ओर ,घनी आबादी से दूर हिमालय की गोद में ,हरियाली से ओतप्रोत था।विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि देहरादून के इतने समीप होते हुए भी यहां एक दम अपूर्व शांति थी।थोड़ी ऑप चारिक्ता के पश्चात भरपूर भोजन किया और गुलाबी ठंड का आनंद लेते हुए ,गरमागरम रजाइयों मे घुसते ही निंद्रा देवी की आरामदायक गोद में ,अपने को समर्पित कर दिया। अगली सुबह सूर्योदय से ही पहले पक्षियों की मधुर चहचहाट से आंख खुली तो प्रतीत हुआ की ये सुबह मेरे लिए, एक नई अनुभव से ओतप्रोत थी।रजाई से कदम बाहर निकले ,कमरे का दरवाजा खोला तो एक तीव्र ठंडी परन्तु एक अनोखी खुशबू से भरी हवा के झोंके ने जैसे मेरा स्वागत किया।दूर सामने उदय होते सूर्य की लालिमा से हिमालय की तराई के ये पहाड़, जैसे लाल रंगों मे लिपटे ,नीले आकाश के बैकग्राउंड से एक अदभुत,मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे ।ना जाने मै ,इस प्रातः के
मनमोहक आकर्षण मे कब तक बंधा खड़ा रहा कि तभी दो चीजें अचानक हुई एक इस खूबसूरत ठंडी सुबह के समय नथुनों मै समाती चाय की भीनी भीनि महक,साथ ही छोटे भाई का स्वर “” भाई साहब गरमागरम चाय तैयार है “,पलट के देखा तो मेरे ठीक पीछे ना जाने कब के उठे, मेरे साथ आए सहयोगी भी ,मेरी ही तरह इस सुबह के सम्ममोहन मे डूबे खड़े थे ! चाय की प्याली के साथ ही अचानक गूगल बाबा का ,कभी का पढ़ा एक संदेश स्मरण हो आया ,

जो भारतीय किसी भी कारणों से स्वीत्जर लैंड नही जा सकते ,तो वे अगर मध्य  हिमालय के मनमोहक परन्तु स्तब्ध करनेवाली यात्रा पर एक बार ही चले जाएं   तो वे हमेशा के लिए स्वीत्जर लैंड जाना भूल जाएंगे! फिर क्या था,हम सब तो इस यात्रा के लिए ही आए थे !

     

 

 एक घंटे पश्चात ही हम बढ़ चले थे अपनी वर्षों की चाहत भरी ** हिमालय ** की यात्रा पर !

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