
गहरी नींद में अगर आपको कोई झकझोर के उठाए तो आप जानते ही होंगे कि उठने वाला उस समय क्या फील कार्य होगा ,कुछ ऐसा ही हम सब ने फील किया जब हमारे मेजबान , होम स्टे के मालिक ने हमे उठाया ।हम कुछ बोलते कि उसने कहा “” सर जी ,आप इतनी दूर से आए हैं ,जब कि इतने रिमोट एरिया में कभी कभी ही कोई यात्री आते हैं ,तो सोने को बहुत रातें मिलेंगी , उठिए ,जब आप यहां आए ही हैं तो मैं आपको ऐसी जगह दिखाऊंगा कि आगे जितना भी पहाड़ों में आप घूमेंगे ,इस से खूबसूरत दृश्य आपको नही मिलेंगे ,देखने को “”!

उसकी बातों में जाने क्या बात थी कि हम सब आंख मलते मलते ,ना चाहते हुए भी ,उसके साथ चलने को तुरंत तैयार हो गए ।अभी सुबह के छः ही बजे थे । बाहर ,दूर दूर तक दिखते पहाड़ों में ,उदय होते सूरज की लालिमा अभी छानी शुरू ही हुई थी।इतनी सुबह ,इतनी शांति को अगर कोई भंग कर रहा था तो वो थी ,तरह तरह के पक्षियों की आवाजें ।ये इतनी मीठी ,मधुर , और हमारे लिए नई थी कि हमारी सारी तंद्रा एक दम गायब हो गई ! ठंडी शीतल हवा ,चारों ओर छाई हरियाली ,एक दम अछूती जगह ,इस समय हमे जो लगा ,उसे शब्दों में वर्णित करना , मेरे लिए आज भी संभव नहीं है ।इन सब का आनंद केवल स्वयं ही यहां आ कर ही महसूस कर सकते हैं।

होम स्टे के बाहर जब हम अपनी कार की ओर बढ़े ,तो मेजबान बोले ,नही नही ,पैदल ही चलना है।पैदल, हमने टोका तो फिर बोले ,जी हां ,आप को सामने खड़े पहाड़ की चोटी पर ट्रेक करके जाना है ।कितनी दूरी तो उत्तर आया ,सिर्फ पांच किलोमीटर !!

शायद आपको पांच किलोमीटर की दूरी कोई अधिक नही लगेगी ,पर जब सीधे खड़े पहाड़ की चोटी जिसकी ऊंचाई कोई एक हजार फुट की रही होगी ,रास्ता ऊबड़ खाबड़ ,पगडंडी और सीढ़ी नुमा हो,तो ये अनुभव भी जान निकालने वाला ही होगा ,फिर भी शायद ही ऐसा अवसर ,जीवन में कभी दुबारा मिले,साथ ही इस आशा के साथ कि जरूर पहाड़ की चोटी से कुछ अनोखे नजारे दिखें ,हम ने चुपचाप उनकी बात मान ली ।

शांत ,नीरव वातावरण में हम सब उनके पीछे पीछे, चोटी की चढ़ाई से जूझने लगे ।

नौ हजार फुट की ऊंचाई ,सांस फूलने ,हवा ठंडी होने पर भी ,शरीर पसीने से लथपथ ,हर फुट चलने पर सोचते ,अब आगे नहीं चला जायेगा ,परंतु ऊपर पहुंचने के दृढ़ निश्चय ,हमे होंसला दे रहा था । जैसे जैसे ऊपर चढ़ते गए ,हमारे आसपास की दुनिया ,चारों ओर फैली पहाड़ों की चोटियां , हमसे नीचे होने लगी ।ये इतना शानदार अनुभव हो रहा था कि इन तमाम सारी कठिनाइयों में भी एक बात का अहसास हमे ,ताकत ,रोमांच दे रहा था कि हम अब माउंटेरियन हो गए हैं !!

आखिर कार जब हम आखिरी कदम रख ,ठीक चोटी पर पहुंचे तो सामने एक अच्छा खासा लंबा ,चौड़ा छोटी, पीली ,सुखी खास का ,थोड़ा समतल ,थोड़ा ऊंचा नीचा, मैदान ,जिसे पहाड़ों में “” बुग्याल “” बोलते है ,दिखाई दिया ।थकान से पस्त हम तुरंत ही घास के ऊपर लम लेट हो गए ।कुछ देर आंख बंद कर ,एक दम शांति ,सुकून का अद्भुत आनंद लिया ,फिर उठ खड़े हुए ।

हमारे मेजबान ने मैदान के एक थोड़े ऊंचे उठे कौने में चलने का संकेत किया ।हम चल दिए ।जैसे ही उस तीस चालीस फुट ऊंचे,चौड़े ,कौने पर पहुंचे ,वहां हमने जो नजारा देखा ,कुछ क्षण के लिए तो हम भौंचक्के ही , रह गए ।हमारे ठीक सामने थी ,सफेद ,झक ,बर्फ से पूरी तरह ढकीं ,विशाल ,हिमालय की ,विशाल चोटियां ।उस समय ,बिल्कुल ऐसा लगा कि जैसे अगर हम अगर हाथ बढ़ाएं तो उन्हे छू सकते हैं।उनके और हमारे बीच अब कोई और पहाड़ नही थे ।हम जिस चोटी पर खड़े थे ,वो अंतिम ,हरा भरा ,पहाड़ था ,जिसके ठीक बाद ,,महान हिमालय की महान ,बर्फ से लदी चोटियां थी ।उन सब के ठीक नीचे बड़े बड़े बर्फ के ग्लेशियर थे । कुछ क्षणों तक हम सब निशब्द ,सम्मोहित से खड़े ,इस अद्भुत पलों,दृश्यों का आनंद लेते रहे ।इस समय ,दूर दूर तक ,चारों तरफ , जहां तक भी हम देख सकते थे , केवल ,हम और हम ही थे । हम इतनी अधिक ऊंचाई पर थे कि लगा रहा था जैसे कि हम, नीले खुले आसमान के नीचे, पहाड़ जैसी किसी विशाल छत के ऊपर खड़े हुए सामने बर्फ की विशाल दीवार के सामने , बौने दिखाई देते,आस पास के छोटे बड़े पहाड़ देख रहें हों ! उस स्थान पर इतनी निरवता थी कि अगर इस निरवता को ,कोई भंग कर रहा था तो वो थी सिर्फ ,हमारे कानों में सरसराती ,हवा के मध्यम मध्यम झोंके !!

हमने जब मेजबान से पूछा की क्या हम सामने दिखते बर्फ की चोटियों तक जा सकते है तो वे मुस्कुराने लगे ।सर ,जो सामने आप देख रहें है उनमें है प्रसिद्ध “” नंदा देवी “” पर्वत ,,उसके साथ दिखाई दे रहा है नागा पर्वत की चोटी, और है , हाथी पांव की विशाल चोटियां ।वहां तो केवल कुशल पर्वत रोही ही जा सकते हैं । हां ,जो नंदा देवी की चोटी दिखाई दे रही है, ,उसके ठीक नीचे जो ग्लेशियर है ,उसके किनारे तक ,प्रत्येक बारह वर्ष में होने वाली “” नंदा देवी की राज जात यात्रा “” जाती है ।इस यात्रा में शामिल होने के लिए ,पूरे उत्तर खंड से सैकड़ों यात्री आते है ।आपको ये जानकर आश्चर्य होगा की इस यात्रा में बीस दिन के करीब समय लगता है ।हालांकि उत्तराखंड की इस यात्रा को ,उत्तराखंड की सरकार द्वारा सरकारी यात्रा की मान्यता मिली हुई है ,जिसके लिए बहुत कुछ सरकार इंतजाम करती है ,फिर भी ये यात्रा अत्यंत कठिन है । मैने फिर पूछा कि ये यात्रा किस लिए की जाती है तो उन्होंने जो बताया ,वो हैरान कर देने वाला था ।उनके अनुसार, पार्वती जी को उत्तराखंड में नंदा के नाम से पुकारते हैं ,उन्ही के नाम पर इस चोटी का नाम “” नंदा देवी “” रखा गया है । मान्यता है कि प्रत्येक बारह वर्ष बाद पार्वती जी शिव धाम से अपने मायके यहां आती है ,ओर फिर एक माह पश्चात ,वापस धूम धाम के साथ अपने ससुराल शिव धाम को वापस जाती हैं।उन्हे इस नंदा देवी की चोटी तक, विदा करने के लिए ही पूरे उत्तर खंड से भक्तजन उनके साथ साथ इस नंदा देवी चोटी के नीचे ,ग्लेशियर तक जाते हैं ।उसके पश्चात मन ही मन देवी को शिव जी के पास जाने के लिए विदा कर देते हैं ।ग्लेशियर पर कुछ है क्या ,जी हां ,उस ग्लेशियर के ठीक आरंभ में एक मानव निर्मित ,अत्यंत प्राचीन तालाब , है ,जो की पक्के पत्थरों से बना हुआ है ।उसमे यात्रा के अंत में ,यात्री स्नान करके ,लौटते हैं।मेजबान की बातें इतनी रोचक थी कि मैने फिर पूछा ,क्या ये तालाब तुमने देखा है ? जी हां, मैने स्वयं इस तालाब में स्नान किया है, दो वर्ष पूर्व हुई राज जात यात्रा में भाग ले कर ! निशब्द मैं ,उसकी इन बातों को सुन कर अचरज में पड़ गया ।मन ही मन उसकी भक्ति और हिम्मत को सराहता रहा !!

लगभग एक घंटे का समय , ,प्रकृति के इस अद्भुत नजरों को देखते हुए बिताने के बाद हम वापस होम स्टे की ओर चल पड़े ।मन तो कह रहा था कि कुछ और समय हम यहां बिताते ,परंतु अभी हमे आगे भी ,दस घंटे की यात्रा पर आगे बढ़ना था ,इस लिए मन को समझाते हुए लौट ने को मजबूर होना ही पड़ा ।वापस होम स्टे आते समय ,मेजबान ,वापसी के मार्ग से कुछ है कर ,हमे एक स्थानीय निवासी के घर ,उनका राजन सहन दिखाने ले गए ।पहाड़ी के आंचल में बना एक दो मंजिला घर , जिसकी नीचे की मंजिल पर पालतू पशु जो कि बकरी एवम दो भैंसे थी ,का विश्राम स्थल था ,ऊपर की मंजिल पर ग्रह स्वामी का निवास स्थान था ।घर के सामने थोड़ा सा चौड़ा खुला आंगन ,उसके ठीक किनारे सीधे तीस फिट के करीब सीधी ढलान ,फिर थे उनके सीढ़ीदार खेत ,जिनमे ,मटर ,मक्का ,मूली ,आदि तरह तरह की सब्जियां वे उगाते थे ।इस तरह वे बिना किसी और के सहारे निर्भर हुए, स्वयं जीवी थे ।बड़े ही प्रेम से उन्होंने हमारा स्वागत किया ।गरम गरम दूध ,आतिथ्य के रूप में दिया ,साथ ही हमें अपना घर अंदर से देखने को आमंत्रित भी किया ।
यहां ,इस अनजाने ,अचानक में मिला ,रात्रि प्रवास का अवसर , ट्रेकिंग का अनुभव ,बर्फ से लदी ,चमकती ,हिमालय की चोटियां ,उत्तराखंड के निवासी के रहने के घर को ,नजदीक से देखने का सुअवसर ,सुदूर पहाड़ों के बीच बसा ,एक अनजाना गांव “” शाम “” पहुंचना ,ये सब हमारे मन मस्तिष्क में कभी न भूलने वाला अवसर बन कर शायद हमेशा स्थिर रहेगा ।आप सभी सुधि पाठकों से निवेदन है अगर कभी उत्तराखान के चारों धाम घूमने की योजना बनाएं तो , पांचवा धाम इस “” शाम “” गांव को अवश्य शामिल करें , जिसका अनुभव हमारी तरह ,जीवन पर्यन्त आप शायद ही भूल पाएंगे !!
लेकिन फिर एक बात हुई , कि हम प्रसिद्ध ,दुर्गम शहर “” मुंसियारी “” , जहां हम ,हिमालय की इन्ही बर्फ से ढकी चोटियों को देखने जा रहे थे ,हमारा मन उचाट हो गया ।हम समझ चुके थे कि जो लाजवाब दृश्य , हमें ,ट्रेकिंग के बाद दिखाई दिए थे ,वो शायद ही मुंसियारी में देखने को मिलेंगे ,फिर भी हमे वहां जाना ही था ,इस लिए ,होम स्टे में दोपहर का भोजन कर ,चल दिए “” मुंसियारी “” की और !
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